सपा के पास बड़ा मौका, जानिए भाजपा के सामने क्या है चुनौती
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में कुर्मी और पासी बिरादरी (जाति) के नेताओं और मतदाताओं की चांदी होने वाली है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) लगातार तीसरी बार चुनाव जीतने की हैट्रिक बनाने के लिए इन दोनों वर्गों को हर हाल में अपने साथ जोड़कर रखना चाहती है।
वहीं, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी SP की रणनीति भाजपा के इस मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाकर अपनी हार का सिलसिला खत्म करने की है।
अपनी इस रणनीति को कामयाब बनाने के लिए दोनों ही पार्टियों ने इस बार चुनाव में कुर्मी और पासी समाज के लोगों को भारी संख्या में टिकट देने के साफ संकेत दिए हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुर्मी और पासी समुदाय आगामी चुनावों में जीत की सबसे बड़ी चाबी माने जा रहे हैं।
राज्य में करीब 8 फीसदी आबादी वाली कुर्मी बिरादरी और 4 फीसदी आबादी वाली पासी बिरादरी मिलकर लगभग 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर हार-जीत और जनादेश की दिशा तय करने की क्षमता रखती हैं।
सपा का नया सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला
इसी को ध्यान में रखते हुए समाजवादी पार्टी सपा ने एक नई सोशल इंजीनियरिंग तैयार की है जिसके तहत वह अपने पारंपरिक ‘मुस्लिम यादव’ समीकरण से आगे बढ़कर कुल 403 में से करीब 323 टिकट गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को देने की योजना बना रही है। इसमें कुर्मी और पासी समुदाय को पहली और दूसरी प्राथमिकता दी जाएगी।
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दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों के बड़े हिस्से को साधने के लिए करीब 300 टिकट इसी वर्ग में बांटने का ताना-बाना बुन रही है।
भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि जाटव, यादव और मुस्लिम वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा उनके खिलाफ रहता है, इसलिए कुर्मी और पासी वोट बैंक का साथ पाना उनके लिए भी बेहद जरूरी है।
आंकड़ों के लिहाज से भी इन समुदायों का सियासी असर बढ़ा है यादवों और मुस्लिमों की तुलना में कम आबादी होने के बावजूद 2022 के चुनावों में 40 कुर्मी और 25 पासी विधायक जीतकर आए थे, जो राज्य की सियासत में उनके बढ़ते प्रभुत्व को साफ दर्शाता है।
गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों में राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ने से वोटिंग पैटर्न बदला है। पिछले चुनाव में सपा ने 12 कुर्मी उम्मीदवार उतारे जिसमें 7 जीते, जबकि भाजपा के 5 में से केवल 3 उम्मीदवार ही जीत सके।
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