बोफोर्स घोटाला समाप्त: सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम याचिका खारिज की, 40 साल पुराने बहुचर्चित मामले का कानूनी अंत
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अंतिम याचिका ख़ारिज कर दी हिंदुजा बंधुओं को बरी करने वाले फैसले के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई थी साथ ही करीब 40 साल पुराने चर्चित बोफोर्स घोटाले का क़ानूनी अध्याय पूरी तरह समाप्त हो गया है
नई दिल्ली: भारत के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चलने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में से एक, बोफोर्स कांड का कानूनी अध्याय अब हमेशा के लिए बंद हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर अंतिम अपील को भी खारिज कर दिया है, जिसमें हिंदुजा ब्रदर्स को बरी कर दिया गया था।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की बेंच ने याचिकाकर्ता (अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल) की स्थगन की मांग को ठुकराते हुए आखिरी याचिका खारिज कर दी।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा इस मामले में की गई अपील को सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में ही देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। साल 1986 में हुए इस रक्षा सौदे का विवाद लगभग 40 वर्षों तक अदालतों और भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा।
यह पूरा मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के उस समझौते से जुड़ा है, जिसके तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपें खरीदी जानी थीं।
साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि इस सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को अवैध कमीशन दिए गए थे।
इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया था। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर गंभीर सवाल उठे और 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक बड़ा कारण माना गया।
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मामले में सीबीआई की जांच
सीबीआई ने जनवरी 1990 में इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी। इसमें बोफोर्स कंपनी के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन आर्डबो और कथित बिचौलिए विन चड्ढा समेत कई लोगों को आरोपी बनाया गया।
बाद में जांच का दायरा बढ़ाते हुए इसमें इतालवी कारोबारी ओटावियो क्वात्रोच्ची का नाम भी शामिल किया गया। अक्टूबर 2000 में दायर की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हिंदुजा बंधुओं (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा) का नाम भी सामने आया था।
दिल्ली हाईकोर्ट का 2005 का फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई 2005 को अपने एक ऐतिहासिक फैसले में हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश फर्म एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था।
इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने सीबीआई की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हुए यह टिप्पणी भी की थी कि इस जांच पर सरकारी खजाने के लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के इतने लंबे समय तक खिंचने पर गहरी हैरानी जताई। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, ‘हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई को लेकर यह सब क्या चल रहा है? सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी हैं, यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं?’
वहीं, वकील द्वारा यह याद दिलाने पर कि यह सौदा 1986 में हुआ था, बेंच ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और किसी भी तरह की देरी या सुनवाई की गुंजाइश नहीं बची है।
सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम निर्णय के साथ ही बोफोर्स पे-ऑफ केस से जुड़ी सभी कानूनी लड़ाइयां अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई हैं।
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