जासूसी केस: हाईकोर्ट की गलती सुधारते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की झबराराम की जमानत
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश की सुरक्षा को सर्वोपरि बताते हुए पाकिस्तान को खुफिया जानकारी भेजने वाले एक आरोपी की जमानत खारिज कर दी है।
इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी को सिर्फ इस तकनीकी आधार पर राहत दे दी थी कि गिरफ्तारी के समय उसे कारणों की लिखित जानकारी नहीं दी गई थी। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
देश की सबसे बड़ी अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए साफ कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील जासूसी मामलों में ऐसी तकनीकी कमियों के आधार पर आरोपियों को जमानत नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने जासूसी केआरोप झबड़ा राम को दो गिफ्ट में सरेंडर करने का आदेश दिया है। जस्टिस एमएम सुदेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने साफ किया कि इस केस में गिरफ्तारी के नियमों का ठीक से पालन हुआ था।
अदालत में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल राजकुमार भास्कर ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने देश की सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोपों को नजरअंदाज कर महज तकनीकी कमी के आधार पर जमानत दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सही माना।
राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में बड़ी कानूनी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामलों में जैसे कि जासूसी गिरफ्तारी के कारणों की लिखित सूचना देना हर स्थिति में अनिवार्य नहीं है।
यदि आरोपी को मौखिक रूप से आधार बता दिए गए हैं और उसे अपना बचाव करने में कोई व्यावहारिक कठिनाई या नुकसान नहीं हुआ है तो प्रक्रिया की किसी मामूली तकनीकी कमी के आधार पर उसकी हिरासत को अवैध नहीं ठहराया जा सकता और न ही उसे जमानत मिल सकती है।
यह मामला झबराराम नामक व्यक्ति की गिरफ्तारी से जुड़ा था, जिसे जयपुर से जासूसी और विदेशी हैंडलर्स को सेना की जानकारियां भेजने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। सुनवाई के दौरान उसके वकीलों ने तर्क दिया था कि गिरफ्तारी के कारण लिखित में न देना संविधान के अनुच्छेद 22(1) और बीएनएसएस की धारा 47 का उल्लंघन है।
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वहीं, सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने इन तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि कानूनी नियमों का पूरी तरह पालन हुआ था और आरोपी को पहले से ही आरोपों की पूरी जानकारी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत आरोपी को जमानत दी गई थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य सिद्धांत पूर्वाग्रह आधारित परीक्षण’ पर आधारित है यानी यह देखना जरूरी है कि क्या प्रक्रिया की कमी से आरोपी को वास्तव में कोई नुकसान हुआ है या नहीं। साथ ही अदालत ने आरोपी को दो सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया है और यह भी स्पष्ट किया कि इन टिप्पणियों का ट्रायल की कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
पाकिस्तानी जासूसी नेटवर्क का खुलासा
यह मामला ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923’ (OSA) की धारा 3 और 9, तथा ‘भारतीय न्याय संहिता, 2023’ (BNS) की धारा 152 और 238(b) के तहत अपराधों से जुड़ा है। इसमें आरोप है कि प्रतिवादी, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस (ISI) से जुड़े विदेशी हैंडलर्स के संपर्क में था और पैसों के बदले पोखरण तथा जैसलमेर से सेना की संवेदनशील तस्वीरें, वीडियो और सैनिकों की आवाजाही की जानकारी उन्हें भेज रहा था।
जासूसी के आरोप को जनवरी 2026 में नोटिस देने और गवाहों के सामने अरेस्ट मेमो पढ़ कर सुनने के बाद गिरफ्तार किया गया था। मजिस्ट्रेट के सामने पेशी दौरान आरोपी या उनके वकील ने कारणों की जानकारी न मिलने पर कोई शिकायत नहीं की।
इसके बाद मार्च 2026 में सत्र अदालत ने भी माना कि अरेस्ट मेमो पर दस्तखत होना क़ानूनी रूप से पर्याप्त है और उनकी ज़मानत ख़ारिज कर दी। हालांकि मई 2026 में हाईकोर्ट ने इस तकनिकी आधार पर उसे जमानत दे दी कि गिरफ़्तारी की वजहें लिखित रूप में नहीं सौपी गई थी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है।
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