हाईकोर्ट की दो टूक: देश भले चांद पर गया, सामाजिक भेदभाव आज भी बरकरार
नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाथ से मैला ढोने की प्रथा पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है की देश भले ही चांद पर पहुंच गया हो लेकिन जातिवाद की सामाजिक बुराई आज भी मौजूद है जो लोगो को ऐसा अमानवीय काम करने को मजबूर करती है।
की अदालत ने नागरिकों की गरिमा को सर्वोपरि मानते हुए महाराष्ट्र सरकार की उस नीति को ख़ारिज कर दिया जिससे सीवर या टेंक की सफाई के दौरान जान गंवाने वाले मजदूरों के परिवारों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी निजी सोसाइटियों और मकान मालिकों पर डाल दी गई थी हाईकोर्ट ने साफ़ किया की इस तरह के मामलो में जवाबदेही से बचने के सरकारी प्रयास पूरी तरह गलत है।
सीवर सफाई में मौत पर बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह खतरनाक सफाई के दौरान जान गंवाने वाले पीड़ितों के आश्रितों को तुरंत 30 लाख रुपये का मुआवजा दे और बाद में चाहे तो संबंधित निजी संस्थाओं या नियोक्ताओं से वह राशि वसूल कर ले।
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अदालत ने सरकार को आदेश दिया है कि वह छह महीने के भीतर मैनुअल स्कैवेंजर्स अधिनियम 2013 के दायरे में आने वाली ऐसी घटनाओं में जान गंवाने वाले सभी व्यक्तियों की पहचान करे। इस दौरान पीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि 21वीं सदी में अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियों के दावे के बावजूद यह एक कड़वी सच्चाई है कि देश में आज भी जातिगत भेदभाव और सामाजिक कुप्रथाएं कायम हैं।
बॉम्वे हाईकोर्ट ने साफ़ किया है की सीवर सफाई के दौरान जान गंवाने वाले मजदूरों के मुआवजे में सरकारी या प्राइवेट के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। अदालत ने निजी मालिकों पर मुआवजे की जिमेदारी डालने वाले सरकारी नियम को समानता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन माना और इस तुरंत रद्द कर दिया। कोर्ट के मुताबिक साल 2013 का सफाई कर्मचारी कानून सभी मजदूरों को एक समान सुरक्षा और अधिकारी देता है इसलिए सरकार अपनी इस जिम्मेदारी को निजी लोगो पर नहीं थोप सकती।
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