पेपर लीक केस में होगी फास्ट ट्रैक कोर्ट से सुनवाई: जानिए कैसे काम करती हैं ये विशेष अदालतें
पीएम नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक मामलों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का ऐलान किया है। जघन्य अपराधों में पीड़ितों को रिकॉर्ड समय में न्याय दिलाने के लिए जानी जाने वाली ये विशेष अदालतें कैसे काम करती हैं और इनमें किन-किन मामलों की सुनवाई होती है, आइए समझते हैं
नई दिल्ली: देश में जघन्य अपराधों के बाद अक्सर न्याय में तेजी लाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का जिक्र आता ही है।
हाल ही में यह व्यवस्था एक बार फिर तब चर्चा में आई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर ऐलान किया कि पेपर लीक मामलों में शामिल दोषियों को सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाएगा।
फास्ट ट्रैक कोर्ट यानी कम से कम समय में सुनवाई पूरी कर फैसला सुनाने वाली विशेष अदालतें। इनकी शुरुआत पहली बार साल 2000 में 11वें वित्त आयोग की सिफारिशों पर जिला और अधीनस्थ अदालतों में लंबित मुकदमों के त्वरित निस्तारण के लिए की गई थी।
हालांकि 2011 में इस योजना के बंद होने के बाद 2012 के जघन्य निर्भया कांड ने इसे फिर से खड़ा किया, जिसके बाद दिल्ली के साकेत कोर्ट परिसर में पहली विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू की गई।
आगे चलकर अक्टूबर 2019 में केंद्र सरकार ने क्रिमिनल लॉ (संशोधन) अधिनियम, 2018 और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत 1,023 ‘फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट’ (FTSC) योजना लागू की।
इसका मुख्य उद्देश्य बलात्कार, पॉक्सो एक्ट और हत्या जैसे जघन्य अपराधों के मामलों का निपटारा कर न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा मजबूत करना था।
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इस योजना के लिए 1,952.23 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया था, जिसमें निभर्या फंड और राज्यों का अंश शामिल है।
30 जून 2025 तक दी गई जानकारी के अनुसार देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 725 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट कार्यरत हैं, जिनमें 392 एक्सक्लूसिव पॉक्सो कोर्ट शामिल हैं।
आंकड़े बताते हैं कि सामान्य अदालतों में जहां प्रति माह औसतन 3.26 मामलों का निपटारा होता है, वहीं फास्ट ट्रैक कोर्ट में यह दर लगभग तीन गुना (9.51 मामले प्रति माह) है। देश में सबसे अधिक 218 फास्ट ट्रैक कोर्ट उत्तर प्रदेश में संचालित हैं।
ये अदालतें मुख्यतः दो श्रेणियों में काम करती हैं: सामान्य फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (जो रेप और पॉक्सो दोनों मामलों की सुनवाई करती हैं) और एक्सक्लूसिव पॉक्सो कोर्ट (जो केवल बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए समर्पित हैं)।
कई मौकों पर इन अदालतों ने रिकॉर्ड समय में न्याय दिया है, जैसे इटारसी में आरोपी को 21 दिनों में फांसी, अप्रैल 2026 में गोरखपुर में मासूम से दुष्कर्म के दोषी को 24 दिनों में आजीवन कारावास और जून 2026 में महाराष्ट्र के नरसापुर में 55 दिनों में आजीवन कारावास की सजा।
हालांकि, न्यायिक प्रक्रिया की बात करें तो फास्ट ट्रैक कोर्ट की कोई अलग कानूनी व्यवस्था नहीं है; इनमें वही जज और आपराधिक प्रक्रिया (BNSS) के नियम लागू होते हैं।
लिहाजा, अन्य सामान्य अदालतों की तरह इन फैसलों के खिलाफ भी संबंधित हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।
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