‘गधे’ वाले तंज से 14 आपत्तियों तक: चुनाव आयोग में आंतरिक टकराव का 37 साल पुराना कड़वा इतिहास
नई दिल्ली: चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बनाए जाने के बाद से ही मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच अधिकारों को लेकर आपसी टकराव का लंबा इतिहास रहा है।
इस सिलसिले में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन का कार्यकाल सबसे अधिक चर्चा में रहा, जब उन्होंने तत्कालीन चुनाव आयुक्तों एम. एस. गिल और जी. वी. जी. कृष्णमूर्ति की नियुक्ति पर तीखी नाराजगी जताई थी।
टी.एन. शेषन की ऐतिहासिक नाराज़गी और विवाद
शेषन ने उस समय दोनों आयुक्तों के प्रति अपना गुस्सा जाहिर करते हुए सार्वजानिक रूप से उन्हे अपने कार्यालय का ‘गधा’ तक कह दिया था, जो संस्था के भीतर वर्चस्व की लड़ाई का सबसे विवादित वाकया माना जाता है।
आजादी के बाद से लेकर अब तक चुनाव आयोग के भीतर बहुसदस्यीय व्यवस्था और सत्ता संघर्ष का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है, जिसकी शुरुआत अक्तूबर 1989 में एसएस धनाओआ और वीएस सीगल की नियुक्ति के साथ हुई थी
जिसे तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त आरवीएस पेरी शास्त्री ने अपने अधिकारों को सीमित करने वाला माना था और जनवरी 1990 तक वह व्यवस्था समाप्त हो गई थी,
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला और ‘फर्स्ट अमंग इक्वल्स
लेकिन 1993 में टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त कार्यकाल के दौरान एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति की नियुक्ति के साथ यह बहुसदस्यीय व्यवस्था दोबारा लौटी जो शेषन के साथ उनके कड़े टकराव और ऐतिहासिक अदालती फैसलों का मुख्य केंद्र बनी, जिसमें 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त दर्जे, शक्तियों और निर्णय लेने के अधिकारों में बराबर यानी ‘फर्स्ट अमंग इक्वल्स’ हैं।
इसके बाद भी 2006 से 2009 के बीच एन गोपालस्वामी द्वारा नवीन चावला के खिलाफ कांग्रेस के प्रति पक्षपात का आरोप लगाकर राष्ट्रपति को हटाने की सिफारिश करने, 2019 में प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के खिलाफ आचार संहिता मामलों पर असहमतियों के चलते अशोक लवासा के कार्यकाल से पहले इस्तीफा देने और मार्च 2024 में अरुण गोयल के इस्तीफे जैसे विभिन्न दौरों में आयोग के भीतर की खींचतान सार्वजनिक होती रही है
और अब मौजूदा दौर में भी चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) द्वारा पिछले 10 महीनों में फॉर्म-6 और डेटाबेस नियंत्रण जैसे फैसलों पर 14 बार आपत्तियां दर्ज कराने की खबरों ने एक बार फिर संस्था के भीतर अधिकारों के बंटवारे और कार्यप्रणाली को लेकर पुरानी बहसों को ताजा कर दिया है।
चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेदों के दावों को ख़ारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण सहित सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए उन आरोपों को भी पूरी तरह बेबुनियाद बताया है, जिनमे वोटर लिस्ट से वैध नाम हटाने और भाजपा के पक्ष में काम करने का दावा किया गया था।
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