ओबीसी और एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर केंद्र सरकार का रुख स्पष्ट
क्रीमी लेयर का सिद्धांत ओबीसी आरक्षण में लागू है, जबकि एससी-एसटी आरक्षण में इसे लागू करने की मांग को लेकर विवाद चल रहा है। सरकार का कहना है कि दोनों वर्गों की सामाजिक परिस्थितियां अलग होने के कारण एक जैसे नियम नहीं अपनाए जा सकते
नई दिल्ली : लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच केंद्र सरकार ने अपना स्पष्ट रुख रखते हुए कहा है कि एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं होता है।
सरकार ने इन याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा है कि एससी/एसटी के आरक्षण में आय के आधार पर कोई भी बदलाव करने से पहले व्यापक समीक्षा, सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों और ठोस अध्ययन की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिकाओं, जिनमें रामाशंकर प्रजापति और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिकाएं शामिल हैं, में मांग की गई थी कि प्रत्येक आरक्षित वर्ग के भीतर आय के आधार पर प्राथमिकता तय की जाए और संपन्न परिवारों को आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाए ताकि हाशिए पर मौजूद लोगों को इसका लाभ मिल सके। 11 अगस्त 2025 और 12 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब केंद्र ने अपना हलफनामा दाखिल किया है।
केंद्र सरकार ने इन मांगों का विरोध करते हुए तर्क दिया है कि एससी-एसटी और ओबीसी एक जैसी श्रेणियां नहीं हैं।
एससी समुदाय को ऐतिहासिक रूप से छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है, जबकि एसटी की पहचान अलग संस्कृति और भौगोलिक पिछड़ेपन से जुड़ी है, वहीं ओबीसी का आधार सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ापन है।
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सरकार का यह भी कहना है कि अदालत सरकार को किसी विशेष तरीके से नीति बनाने का निर्देश नहीं दे सकती क्योंकि नीति निर्माण कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।
संविधान के अनुच्छेदों का हवाला देते हुए सरकार ने कहा कि एससी और एसटी की सूचियों में बदलाव का अधिकार केवल संसद के पास है।
इसके अलावा, क्रीमी लेयर का सिद्धांत 1992 के मंडल मामले के फैसले से जुड़ा है जो मुख्य रूप से ओबीसी के लिए है, जिसकी वर्तमान आय सीमा 2017 से आठ लाख रुपये सालाना निर्धारित है।
भारत में आरक्षण की व्यवस्था के तहत लंबवत (एससी, एसटी, ओबीसी), क्षैतिज (दिव्यांग, पूर्व सैनिक) और आर्थिक आधार पर (ईडब्ल्यूएस) आरक्षण का प्रावधान है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी मामले के फैसले के तहत कुल आरक्षण (ईडब्ल्यूएस को छोड़कर) की 50 प्रतिशत सीमा तय की गई है।
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