नीट परीक्षा ख़त्म करने की मांग को लेकर तमिलनाडु विधानसभा ने उठाया बड़ा कदम, प्रस्ताव पारित
हालिया पेपर लीक विवाद और उसके चलते विरोध में प्रदर्शनों के बीच मंत्री के जी अरुणराज की और से पेश किए गया इस प्रस्ताव में केंद्र सरकार से स्नातक चिकित्सा पाठयक्रमो में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा को पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय लिया गया है
नई दिल्ली: तमिलनाडु विधानसभा ने मंगलवार को नीट (NEET) के अस्तित्व के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया है। हालिया पेपर लीक विवाद और उसके चलते हुए विरोध प्रदर्शनों के बीच, राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के.जी. अरुणराज की ओर से पेश किए गए इस प्रस्ताव में केंद्र सरकार से स्नातक चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा को पूरी तरह समाप्त करने का आग्रह किया गया है। तमिलनाडु में सत्ताधारी टीवीके और कांग्रेस के अलावा मुख्य विपक्षी दल डीएमके, एआईएडीएमके और अन्य दलों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि एकमात्र भाजपा विधायक ने सदन से वॉकआउट कर दिया।
मंत्री के जी अरुणराज ने आरोप लगाते हुए कहा
मंत्री अरुणराज ने आरोप लगाया कि नीट ने छात्रों का ध्यान स्कूली पाठ्यक्रम से हटाकर केवल महंगे कोचिंग केंद्रों पर केंद्रित कर दिया है, जिससे ग्रामीण और सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित छात्रों के लिए चिकित्सा शिक्षा के अवसर गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
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प्रस्ताव में तर्क दिया गया है कि 12 साल की स्कूली शिक्षा के बाद एक दिवसीय प्रवेश परीक्षा छात्रों के भविष्य का निर्णय नहीं होनी चाहिए, और सरकार चाहती है कि मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश कक्षा 12 की परीक्षा के अंकों के आधार पर हो, जैसा कि पिछली सरकारों द्वारा भी चाहा गया था। इसमें इस बात पर भी चिंता जताई गई कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना राज्य का पूर्व में पारित छूट संबंधी विधेयक लंबित है।
इसके अलावा, प्रस्ताव में प्रश्नपत्रों के लगातार लीक होने, परीक्षा प्रणाली की अनियमितताओं, योग्य छात्रों की परेशानियों और परीक्षा के तनाव से जुड़ी छात्र आत्महत्याओं का हवाला दिया गया है। इसे खत्म करने के लिए केंद्र सरकार से राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 सहित अन्य संबंधित कानूनों में संशोधन करने की मांग की गई है। उल्लेखनीय है कि 2017 तक अनिवार्य राष्ट्रव्यापी बनी नीट परीक्षा का तमिलनाडु समेत देश के कई अन्य राज्यों में लगातार विरोध होता रहा है, जिसमें आलोचकों का तर्क है कि यह परीक्षा महंगे कोचिंग का खर्च उठाने वालों को फायदा पहुंचाती है और राज्यों के शैक्षिक अधिकारों का हनन करती है।
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