सत्र टलने पर भी संसद बंद न होने पर भड़की कांग्रेस, पूछा परदे के पीछे क्या खिचड़ी पका रही सरकार
नई दिल्ली: कांग्रेस ने शुक्रवार को मानसून सत्र स्थगित होने के बाद भी संसद को आधिकारिक तौर पर पूरी तरह बंद न करने को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला बोले है। मुख्य विपक्षी दाल ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा की सरकार इस देरी के जरिए भीतर ही भीतर परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने की जुगत में लगी है। कांग्रेस के मुताबिक सरकार इस समय का इस्तेमाल सांसदों को आपने पक्ष में करने और संसद में जरुरी दो तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा जुटाने के लिए कर रही है।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने सत्रावसान में देरी का अपना ही 2015 का रिकॉर्ड तोड़ दिया है क्योंकि जहां 2015 के मानसून सत्र में संसद के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने और सत्रावसान के बीच 28 दिनों का अंतर था, वहीं 2026 के मानसून सत्र में यह अंतर बढ़कर 29 दिनों तक पहुंच गया है, जबकि आम तौर पर यह प्रक्रिया तीन से चार दिनों में पूरी हो जाती है और सत्र समाप्त न करके सरकार विपक्ष पर दबाव बनाने तथा उसे डराने का प्रयास कर रही है।
परिसीमन के मुद्दे पर गोपनीयता और सर्वदलीय बैठक न बुलाने पर सवाल
रमेश ने दावा किया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि सरकार के पास फिलहाल जरूरी संख्या नहीं है, और उन्होंने आरोप लगाया कि 17 अप्रैल 2026 को इस विधेयक के खिलाफ वोट देने वाली तीन पार्टियों में पहले ही विभाजन कराया जा चुका है तथा अन्य दलों पर दबाव, डराने-धमकाने व प्रलोभनों के जरिए रुख बदलने का दबाव बनाया जा रहा है।
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इसके अलावा, जयराम रमेश ने यह भी सवाल उठाया कि मोदी सरकार मार्च 2026 के मध्य से लगातार सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग कर रहे विपक्षी दलों के बावजूद परिसीमन जैसे देश के मूल सिद्धांतों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा क्यों नहीं कर रही है और इतनी गोपनीयता क्यों बरत रही है, तथा उन्होंने चेतावनी दी कि सरकार पर्दे के पीछे भले ही कुछ गड़बड़ करने की तैयारी में हो, लेकिन वह दागी बहुमत हासिल करने में कभी कामयाब नहीं होगी।
बजट सत्र के दौरान महिला आरक्षण के लिए जरुरी परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक निचले सदन में गिरना मोदी सरकार के लिए एक बड़ा झटका था। इस अहम प्रस्ताव पर हुए मतदान में कुल 528 सांसदों ने हिस्सा लिया था जिसमे से 298 ने इसके समर्थन में और 230 ने इसके खिलाफ वोट किया। सासद में किसी भी संविधान संशोधन को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत के नियम के मुताबिक काम से काम 352 वोटो की जरुरत थी लेकिन जरुरी आंकड़ा न जुटने के कारण यह विधेयक संसद से मंजूर नहीं हो सका।
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