महुआ मोइत्रा का दावा: सॉफ्टवेयर ने गायब किए 58 लाख वोटर्स के नाम
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की वोटरलिस्ट को लेकर जारी विवाद SIR अब सिर्फ नाम छोड़ने या हटाने तक सिमित नहीं रहा बल्कि इसमें एक नया नोद आ गया है। TMC सांसद महुआ मोइत्रा के एक सोशल मीडिया पोस्टब ने 24 दिसम्बर 2025 के के उस पुराने पत्र को दोबारा चर्चा में ला दिया है। जिसे राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों WBCS ने लिखा था।
इस पत्र में अफसरों ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान ‘इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर’ ERO की कानूनी शक्तियों और भूमिका पर गंभीर चिंता जताई थी। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि सरकारी सिस्टम से वोटरों के नाम गायब करने के फैसलों की आखिरी ज़िम्मेदारी असल में किसीकी थी।
महुआ मोइत्रा के X पोस्ट में जिस दस्तावेज को सामने रखा गया है वह पश्चिम बंगाल सिविल सर्विस Executive Officers Association की ओर से राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजा गया पत्र है। पत्र की तारीख 24 दिसंबर 2025 है।
इसमें अधिकारियों के संगठन ने SIR के दौरान मतदाता सूची में हो रहे कथित System-Driven Deletion को लेकर अपनी चिंता दर्ज की थी।
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों के संगठन ने साफ किया था कि शुरुआती वोटर लिस्ट जारी होते ही बहुत से लोगों के नाम अचानक हटा दिए गए।
इनमें ऐसे मतदाता शामिल थे जो या तो मर चुके थे कहीं और चले गए थे या जिनके दस्तावेज़ किसी वजह से वापस नहीं आ पाए थे।
महुआ मोइत्रा का दावा
सांसद महुआ मोइत्रा का कहना है कि इस मामले को सिर्फ वोटरों के नाम कटने की शिकायत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। असल विवाद यह है कि चुनाव अधिकारियों ERO के कानूनी अधिकारों और दिल्ली से चलने वाले ऑनलाइन डिजिटल सिस्टम के बीच बहुत बड़ा तालमेल का अभाव था जिसने इस संकट को जनम दिया।
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पत्र में दावा किया गया कि नाम हटाने की प्रक्रिया में ERO की जानकारी या सक्रिय भूमिका के बिना कार्रवाई होने की आशंका थी।
अधिकारियों ने कहा कि बाद में प्रभावित मतदाता स्वाभाविक रूप से ERO को ही जिम्मेदार ठहरा सकते हैं, जबकि उनके अनुसार अधिकारी पूरी प्रक्रिया में शामिल नहीं थे।
जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत वोटर का नाम हटाने से पहले उसे सुनना ज़रूरी है। लेकिन, अधिकारियों को डर है कि केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर ने बिना उनकी मंज़ूरी के ही 58 लाख नाम डिलीट कर दिए।
रिपोर्ट्स के अनुसार वोटर लिस्ट से नाम हटने की बात सामने आई है लेकिन किसी अधिकारी के जानबूझकर अवैध बदलाव करने का ठोस सबूत नहीं मिलता है।
महुआ मोइत्रा के पोस्ट ने इस मुद्दे को फिर से उठा दिया है, जिससे अब मुख्य सवाल यह है कि इस प्रक्रिया में जवाबदेही किसकी थी। अधिक जानकारी के लिए महुआ मोइत्रा के आधिकारिक प्लेटफॉर्म पर जाएं।
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