जहरीली शराब पर एक्शन लेने वाले अधिकारी को ही नोटिस, नियमो की आड़ में किसे बचाने की कोशिश
नई दिल्ली: सागर में जहरीली शराब पीने से हुई मौतों ने पुरे राज्य में शारब की चेकिंग और उसकी कलिटी पर बड़े सवाल खड़े कर दिए है। इसी बीच जबलपुर से एक ऐसा हैरान करने वाला मामला सामने आया है जिसने सरकारी महकमे के काम करने के तरीके को ही कटघरे में ला दिया है।
जबलपुर के असिस्टेंट एक्साइज कमिश्नर संजीव कुमार दुबे ने 6 सितंबर को ‘सागर गोल्ड’ शराब की बिक्री बंद करने का हुक्म दिया था। यह कदम उन्होंने सागर में इसी ब्रांड की जहरीली शराब पीने से हुई मौतो के बाद उठाया था जहां उन्होंने इस शराब को जानलेवा बताते हुए रोक लगाई थी।
मगर इस फैसले के तुरंत बाद कमर्शियल टैक्स डिपार्टमेंट ने उल्टा संजीव् दुबे को ही कारण बताओ नोटिस थमा दिया और 15 दिनों में जवाब माँगा है। विभाग का आरोप है की अधिकारी ने शराब की लैब टेस्टिंग कराए बिना और अपने सीनियर अफसरों से मंजुरी लिए बिना ही इसकी बिक्री रोकने का मनमाना आदेश जारी कर दिया।
शराब की बिक्री पर रोक बनाम विभागीय नियम
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा पेंच यह है की शराब की बिक्री रोकने का फैसला सागर में लोगो की मौत होने दे बाद लिया गया था। ऐसे में विभाग के एक्शन ने एक गंभीर बहस छेड दी है कि कब किसी शराब से जान जाने का खतरा हो तो सबसे पहले काम उसकी बिक्री को तुरंत रोकना होना चाहिए या फिर कागजी जाँच और मंजूरी का इंतजार करना।
दूसरी तरफ विभाग का कहना है की अधिकारियो दुबे ने नियमो को ताक पर रखकर यह आदेश दिया जिसे मध्यप्रदेश सिविल सेवा नियम 1966 का उल्लंघन माना है। और इसी वजह से उन पर विभागीय नियमो के तहत कार्यवाई की बात कही जा रही है।
मिलावटी शराब और व्यवस्था की जवाबदेही
मध्य प्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब पीने से हुई मौतों का मामला तूल पकड़ता जा रहा है, जहाँ इलाज के दौरान एक और आरोपी राम सिंह की मौत के बाद विभिन्न रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 25 तक बताई जा रही है, हालांकि जिला प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर अब तक 15 मौतों की पुष्टि की है। शराब बेचने के साथ खुद इसका सेवन करने वाले राम सिंह की हालत बिगड़ने पर उसे पहले बंडा अस्पताल और फिर बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था, जहाँ मंगलवार को उसकी मौत हो गई।
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इस मामले में पुलिस ने कार्रवाई तेज करते हुए 30 नामजद आरोपियों में से दो और लोगों को गिरफ्तार कर लिया है, जिससे कुल गिरफ्तारियों की संख्या बढ़कर 16 हो गई है और पुलिस आरोपियों के ठिकानों पर लगातार छापेमारी कर रही है।
दूसरी ओर, जबलपुर के एक अन्य मामले ने इस पूरी कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या ‘सागर गोल्ड’ की बिक्री रोकने के आदेश देने वाले अधिकारी को ही नियमों के उल्लंघन का नोटिस मिलना चाहिए था, और बिना रासायनिक जांच के शराब को विषाक्त बताने के बजाय ऐसी स्थिति में तत्काल वैधानिक प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।
सागर शरब कांड को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल व्यवस्था पर खड़ा हो गया है। एक तरफ जहाँ जहरीली शराब के कारण अपनी जान गंवाने वाले लोगो की मौत का जिम्मेदारी तय करने की मांग उठ रही है, वहीं दूसरी तरफ संदिग्ध शराब की बिक्री पर रोक लगाने वाले अधिकारी के आदेश को लेकर खुद विभाग के अंदर ही विरोध शुरू हो गया है।
इस पुरे मामले की जाँच में अब सिर्फ गुनाहगारो को पकड़ना काफी नहीं होगा, बल्कि यह साफ़ करना भी बेहद जरुरी है की इस मिलावटी शारब को वक्त पर पहचानने इसे बाजार में बिकने से रोकने और इस पर कार्यवाई करने में किस स्तर के अधिकारियो से बड़ी लापरवाही हुई है।
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