यूपी में सियासी हलचल: भाजपा-रालोद में गठबंधन सीट बंटवारे पर बातचीत
यूपी में मिशन-2027 के लिए भाजपा और रालोद में सीट बंटवारे की बातचीत शुरू हो गई है, जहाँ ‘सिंबल रालोद का और नेता भाजपा का’ वाला पुराना सपा-रालोद फॉर्मूला लागू होने की सुगबुगाहट के बीच दोनों दलों के नेता आपसी संबंध मजबूत करने में जुट गए हैं
मेरठ: उत्तर प्रदेश में आगामी मिशन-2027 को फतह करने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने सहयोगी दलों के साथ सीटों के तालमेल की बिसात बिछाने में जुट गई है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में भाजपा और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के गठबंधन के बीच सीट बंटवारे का एक बेहद चौंकाने वाला समीकरण सामने आ रहा है।
चर्चा है कि दोनों दलों के बीच 2022 के विधानसभा चुनाव वाला ‘सपा-रालोद मॉडल’ लागू हो सकता है, जिसके तहत “सिंबल रालोद का और चेहरा भाजपा का” रणनीति पर काम किया जा सकता है।
यह फॉर्मूला नया नहीं है। साल 2022 के चुनाव में जब सपा और रालोद साथ थे, तब गुलाम मोहम्मद, अनिल कुमार और चंदन चौहान जैसे सपा के दिग्गज नेताओं ने रालोद के ‘हैंडपंप’ निशान पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की थी।
हालिया उपचुनाव में भी बिजनौर सांसद बनने के बाद खाली हुई मीरापुर सीट पर भाजपा नेत्री मिथिलेश पाल ने रालोद के सिंबल पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी।
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पश्चिमी यूपी की कई पारंपरिक जाट बाहुल्य सीटों पर भाजपा के पास मजबूत और जिताऊ चेहरे हैं, जबकि रालोद ने करीब 33 से 35 सीटों पर अपना दावा ठोका है।
इनमें से कई सीटों पर फिलहाल भाजपा के विधायक काबिज हैं। गठबंधन धर्म निभाने और मौजूदा विधायकों का टिकट कटने से रोकने के लिए यह ‘सिंबल ट्रांसफर’ का रास्ता सबसे मुफीद माना जा रहा है।
इस संभावित फॉर्मूले की भनक लगते ही दोनों ही दलों के नेताओं में बेचैनी बढ़ गई है। जिन भाजपा नेताओं को अपनी सीट रालोद के खाते में जाने का अंदेशा है, वे जयंत चौधरी के दरबार में हाजिरी लगाने लगे हैं, तो वहीं रालोद के कई नेता भी भगवा खेमे के संपर्क में हैं।
दोनों दलों के टिकटार्थी और वर्तमान विधायक अपने शीर्ष नेतृत्व और स्थानीय संगठन के साथ रिश्ते मजबूत करने की होड़ में जुट गए हैं।
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