ऋतब्रत का ममता पर सीधा तंज: प्राइवेट कंपनी नहीं होती राजनीतिक पार्टी
नई दिल्ली: ट्रामूल कांग्रेस TMC का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज करने के चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले पर ऋतब्रत बनर्जी ने प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने ममता बनर्जी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि इस आदेश से यह बात साफ हो गई है कि राजनीतिक दल कोई निजी दुकान या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं जा सकता उन्होंने आगे कहा कि किसी भी राजनीतिक पार्टी पर मालिकाना हक जताकर उसे परिवार के वारिस या वंशवाद के भरोसे नहीं चलाया जा सकता है।
टीएमसी चुनाव चिह्न विवाद
TMC पार्टी के चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद पर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि यह घटनाक्रम पार्टी नेताओं के लिए हैरानी भरा था जिन्हें आयोग के फैसले के बारे में पता चला।
उन्होंने कहा कि ‘प्लेन से उतरते ही हमें पता चला कि सिंबल और नाम को फ्रीज कर दिया गया है। हालांकि एक बात साफ है लोकतंत्र में तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं है।उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि परिवारवादी राजनीति के लिए अब कोई जगह नहीं बची है।
चुनाव चिह्न और नाम को लेकर जो विवाद चल रहा था, उससे यह साबित हो गया है कि कोई भी राजनीतिक दल किसी की निजी कंपनी नहीं होता।
उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी राजनीतिक पार्टी को वसीयत की तरह अपने वारिस को नहीं सौंपा जा सकता और आज के आदेश से यह बात पूरी तरह सच साबित हो गई है।
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ऋतब्रत बनर्जी का बड़ा बयान
ऋतब्रत बनर्जी का यह बड़ा बयान तब सामने आया है, जब चुनाव आयोग ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर अस्थायी रोक लगा दी। आयोग के इस अंतरिम फैसले के तुरंत बाद उन्होंने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राजनीति पर तीखा हमला बोला।
इसके साथ ही विरोधी गुटों को विवाद सुलझने तक नए नाम और चिह्न चुनने का निर्देश दिया।आयोग के इस फैसले का पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा उपचुनावों पर काफी असर पड़ेगा। चुनाव आयोग ने नंदीग्राम और रेजीनगर, इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में 6 अक्टूबर को उपचुनाव कराने का आधिकारिक ऐलान किया था।
चुनाव आयोग ने अपने आदेश में कहा कि उसने अपने पास मौजूद जानकारी पर विचार किया और इस नतीजे पर पहुंचा कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस में दो विरोधी गुट हैं। दोनों ही पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रहे हैं। एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं।
दूसरे का नेतृत्व अरूप रॉय कर रहे हैं। दोनों गुट अब खुद को ही पार्टी बता रहे हैं, इसलिए चुनाव चिह्न आरक्षण और आवंटन आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत आयोग को इस मामले पर ठोस फैसला लेने की जरूरत है।’
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