सरकार गठन में देरी पर सिब्बल का प्रहार: राज्यपाल और BJP को घेरा
दिल्ली: कपिल सिब्बल का यह बयान संसदीय लोकतंत्र में सरकार गठन की संवैधानिक परंपराओं और राज्यपाल की शक्तियों पर एक गंभीर बहस को रेखांकित करता है। उनका तर्क मुख्य रूप से इस संवैधानिक सिद्धांत पर आधारित है कि त्रिशंकु विधानसभा या संसद की स्थिति में राज्यपाल को सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने का न्यौता देना चाहिए। सिब्बल के अनुसार, राजभवन कोई ऐसी अदालत या जाँच एजेंसी नहीं है जो यह तय करे कि किसके पास कितने विधायक हैं; यह प्रक्रिया केवल सदन के पटल पर ‘शक्ति परीक्षण’ के माध्यम से ही संपन्न होनी चाहिए
उनके बयान का तीखा हिस्सा भारतीय जनता पार्टी पर लगाया गया राजनीतिक आरोप है, जिसमें वे राज्यपाल की भूमिका को निष्पक्ष न मानकर उसे सत्ताधारी दल के पक्ष में झुका हुआ बता रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार गठन के निर्णय में देरी करना संवैधानिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है ताकि विरोधी दल (इस संदर्भ में TVK) को संख्या बल जुटाने से रोका जा सके और जोड़-तोड़ की राजनीति के लिए समय मिल सके।
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विधिक रूप से, सिब्बल यहाँ ‘एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ’ जैसे ऐतिहासिक न्यायिक फैसलों की याद दिलाते हैं, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि बहुमत का फैसला राजभवन के कमरों में नहीं बल्कि सदन की गरिमा के भीतर होना चाहिए। उनके इस वक्तव्य का उद्देश्य जनता और संवैधानिक संस्थाओं का ध्यान इस ओर खींचना है कि चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया में भी पारदर्शिता और निष्पक्षता अनिवार्य है। सिब्बल का यह रुख राज्यपाल पद के राजनीतिकरण के खिलाफ एक कड़ा विरोध दर्ज कराता है।
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