TMC विवाद: पार्टी टूटने पर कैसे तय होता है असली नाम और निशान, जाने इतिहास के बड़े सियासी बंटवारे
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस में नाम और चुनाव निशान को लेकर आंतरिक कलह बढ़ गई है, जिसके बाद मामला चुनाव आयोग पहुंच गया है। ममता बनर्जी के गुट और बागी नेताओ के बीच जारी इस विवाद पर 17 सितंबर को आयोग ने एक बड़ा अंतरिम फैसला सुनाया।
चुनाव आयोग ने आगामी उपचुनावों के लिए दोनों ही गुटों पर पार्टी के आधिकारिक नाम ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ और उसके मशहूर ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी है।
तृणमूल कांग्रेस में मई में पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद विभाजन की स्थिति सामने आई, जब बागी विधायकों ने पार्टी के विधायी दल और संगठन पर अपना दावा पेश करते हुए अलग ढांचा बना लिया। इसके बाद दोनों गुटों ने खुद को असली टीएमसी बताते हुए चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया।
चुनाव चिह्न तय करने के नियम
देश में चुनाव चिह्नों का आवंटन निर्वाचन आयोग करता है, जिसके लिए ‘इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड एलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968’ लागू होता है और इसके पैरा 15 के तहत आयोग को राजनीतिक दलों में टूट या विवाद के दौरान चुनाव चिह्न जब्त करने या तय करने का पूरा अधिकार है।
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आयोग पार्टी के संविधान, संगठनात्मक ढांचे, विधायी दल के समर्थन और दस्तावेजों के आधार पर यह फैसला लेता है कि चिह्न किसे मिलेगा। इतिहास में एनसीपी, शिवसेना, एलजेपी, एआईएडीएमके, जनता दल और कांग्रेस में भी टूट के बाद ऐसे विवाद सामने आ चुके हैं, जहां चुनाव आयोग ने इसी प्रक्रिया के तहत फैसले सुनाए थे।
भारतीय राजनीति में साल 1968 से पहले का सबसे बड़ा विभाजन 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया में हुआ था। उस समय पार्टी से अलग हुए एक घड़े ने दिसंबर 1965 में चुनाव आयोग से संपर्क कर खुद को CPI के रूप में मान्यता देने की मांग की।
इस गट ने आंध्र प्रदेश, केरल पश्चिम बंगाल के उन सांसदों और विधायकों की सूची सौंपी जो उनके साथ थे। चुनाव आयोग ने पाया कि इन तीन राज्यों में इस नए गुट को चार फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे जिसके आधार पर आयोग ने इसे सीपीएम के रूप में नई राजनीतिक पार्टी की मान्यता दे दी।
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