यूपी में सीटों की रार: तौल रहे सपा-कांग्रेस, बागियों पर भाजपा की पैनी नजर
उत्तराखंड: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन के बीच सीटों के तालमेल की तस्वीर पूरी तरह साफ़ होने में अभी वक्त लगेगा। कांग्रेस जहां चुनावी तैयारियों को तेजी देने के लिए सीटों का फैसला जल्द चाहती है, वही सपा का पूरा ध्यान केवल जिताऊ और मजबूत उम्मीदवारों को ही मैदान में उतारने पर केंद्रित है। दोनों दलों की अलग-अलग प्राथमिकताओं के कारण सीट शेयरिंग की बातचीत थोड़ी लंबी खिंच सकती है।
उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों के मद्देनजर समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे और चुनावी रणनीतियों को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है, जहां सपा का मुख्य फोकस फिलहाल राज्यसभा चुनाव पर है और माना जा रहा है कि दिवाली के बाद सीटों की संख्या तय होने पर दोनों दल तत्कालीन हालात तथा जातीय समीकरणों के आधार पर अपने प्रत्याशियों का ऐलान करेंगे।
नए नेतृत्व से सुधरेंगे रिश्ते, सीटों पर रार जारी
शीर्ष स्तर पर इस बात पर सहमति बन चुकी है कि चुनाव घोषणा के बाद दोनों दल संयुक्त रैलियों के साथ साझा मुद्दों को उठाएंगे और सपा जिलों के आधार पर तैयार होने वाले घोषणा पत्र में कांग्रेस की भी राय लेगी, जबकि ‘वोट चोरी’ जैसे मुद्दों पर होने वाली इंडिया गठबंधन की रैलियों में भी सपा अपनी सहभागिता निभाएगी।
कांग्रेस को नया प्रदेश अध्यक्ष मिलने और सपा से उनके अच्छे रिश्तों के कारण अब तल्ख बयानबाजी कम होने के आसार हैं, हालांकि कांग्रेस के प्रांतीय नेता 150 सीटों की मांग कर रहे हैं और कांग्रेस हर जिले से कम से कम एक सीट पर चुनाव लड़ना चाहती है।
जबकि सपा 2017 के पुराने फॉर्मूले को नकारते हुए इस बार 2022 के सहयोगियों वाले अनुभव से आगे बढ़कर कांग्रेस को कुछ सीटें देने और खुद 311 के बजाए करीब 350 सीटों पर चुनाव लड़ने के मूड में है।
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पूर्व मंत्रियों की कांग्रेस से नजदीकियां
इसके अलावा, नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य के कांग्रेस के साथ आने और बसपा सरकार के कुछ अन्य पूर्व मंत्रियों की कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकातों के बाद कांग्रेस इन्हें सही समय पर पार्टी में शामिल कर मजबूत प्रत्याशी के रूप में सपा के सामने रख सकती है।
उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में चुनावो की आहट के साथ ही दलबदल का दौर रफ़्तार पकड़ने लगा है। हालाँकि अभी पूर्व मंत्रियो और पूर्व विधायकों का कांग्रेस में शामिल होना जारी है लेकिन असली उलटफेर अक्टूबर के मध्य से शुरू होने की उम्मीद है।
इस चुनावी माहौल में भाजपा की पैनी नजर विशेष रूप से समाजवादी पार्टी के उन असंतुष्ट चेहरों पर टिकी है, जो गठबंधन के कारण अपनी पसंदीदा सीट कांग्रेस के खाते में जाने के बाद भी किसी भी कीमत पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।
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