वांगचुक ने बताया क्यों तोड़ा अनशन, सफदरजंग की तुलना उत्तर कोरिया से की
शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर 26 दिन से भूखे बैठे सोनम वांगचुक ने सरकार से लिखित भरोसा मिलते ही अपना अनशन तोड़ दिया
नई दिल्ली: सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के साथ किसी तरह की डील करने के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
28 जून से प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर 26 दिन से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे वांगचुक ने गुरुवार देर रात अपना अनशन समाप्त किया।
शुक्रवार देर रात जारी एक यूट्यूब वीडियो में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका अनशन खत्म करने का फैसला केवल इसलिए था ताकि आंदोलन में शामिल छात्रों पर कोई कार्रवाई न हो और दिल्ली में किसी संभावित पुलिस कार्रवाई या हिंसा को टाला जा सके।
सरकार से किसी भी तरह के समझौते के आरोपों पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि यदि उन्हें कोई डील ही करनी होती तो वे दिल्ली की भीषण गर्मी में 26 दिनों तक भूखे रहने के बजाय किसी वातानुकूलित कमरे में बैठकर समझौता कर लेते।
वांगचुक ने बताया कि उन्हें सितंबर 2025 में लद्दाख में युवाओं पर हुई पुलिस और सीआरपीएफ फायरिंग की घटना की याद आ गई थी, जिससे उन्हें डर था कि दिल्ली में भी वैसी ही स्थिति न बन जाए।
उन्होंने जानकारी दी कि केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह मेदांता अस्पताल में उनसे मिलने आए थे।
सरकार पहले केवल मौखिक आश्वासन दे रही थी, लेकिन उनके इनकार के बाद केंद्र से तीन प्रमुख मुद्दों पर लिखित आश्वासन मिला।
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इसमें शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर कानूनी कार्रवाई न करने, संसद में परीक्षा सुधार और पेपर लीक पर विस्तृत चर्चा कराने तथा नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने पर सकारात्मक विचार करने की बात शामिल है।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान उन्होंने इस पर तुरंत जोर नहीं दिया क्योंकि उनका पहला उद्देश्य छात्रों को एफआईआर और कानूनी कार्रवाई से बचाना था। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मांग आंदोलन का हिस्सा बनी रहेगी।
अपने अनशन के दौरान के अनुभवों को साझा करते हुए वांगचुक ने आरोप लगाया कि 18 जुलाई को सफदरजंग अस्पताल ले जाए जाने के बाद उनके साथ कैदी जैसा व्यवहार किया गया।
उन्हें बाहर जाने, लोगों से मिलने और अपना मोबाइल या लैपटॉप रखने तक की अनुमति नहीं थी।
दिल्ली हाईकोर्ट से मेदांता अस्पताल जाने की अनुमति मिलने के बाद भी उन्हें कई घंटे रोके रखा गया।
इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि अनशन समाप्त करते समय उनके साथी, आंदोलन से जुड़े छात्र और समर्थक सांसद उनके पास मौजूद नहीं थे, क्योंकि मंत्रियों के पहुंचने से पहले उन्हें मिलने की इजाजत नहीं दी गई थी।
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