क्या कहता है नियम? क्या TMC के बागियों का बिगड़ेगा खेल ?
नियमों के मुताबिक, बिना दो-तिहाई बहुमत के बगावत करना आत्मघाती साबित हो सकता है। यदि बागी विधायक कानूनी रूप से खुद को सुरक्षित करने में नाकाम रहते हैं, तो न सिर्फ उनकी विधायकी जाएगी, बल्कि उनका राजनीतिक भविष्य भी अधर में लटक सकता है
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक दल-बदल और विधायकों की अयोग्यता को लेकर कानून और नियम बेहद स्पष्ट हैं, लेकिन इसके व्यावहारिक नतीजे विधायकों के मामले में विधानसभा अध्यक्ष और सांसदों के मामले में लोकसभा अध्यक्ष के विवेक और कानूनी प्रक्रियाओं पर निर्भर करते हैं।
यदि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी विधायकों या सांसदों की बात करें, तो इस पर दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के नियम लागू होते हैं। आइए समझते हैं कि नियम क्या कहता है और बागियों का खेल कैसे बिगड़ सकता है।
नियम क्या कहता है? (संविधान की 10वीं अनुसूची):
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून के कुछ नियम हैं। इन नियमो का पालन करने पर ही तणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों को संसद में अलग गुट के तौर पर मान्यता मिल सकती है।
स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना:
यदि कोई निर्वाचित विधायक स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी (जिसके टिकट पर वह जीता है) की सदस्यता छोड़ देता है, तो उसकी विधानसभा सदस्यता रद्द की जा सकती है।
पार्टी व्हिप का उल्लंघन:
यदि कोई विधायक सदन में अपनी पार्टी के निर्देशों (व्हिप) के खिलाफ जाकर मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, तो वह अयोग्यता के दायरे में आता है।
मर्जर (विलय) का नियम:
पहले एक-तिहाई (1/3) का नियम था, लेकिन अब नियम यह है कि यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) विधायक एक साथ टूटकर किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं या नया दल बनाते हैं, तभी उनकी सदस्यता सुरक्षित रहेगी। एक-दो या कुछ विधायकों के अलग होने पर उनकी सदस्यता जाना तय है।
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बागियों का खेल कहाँ बिगड़ सकता है?
अगर टीएमसी के बागी विधायक अपनी सदस्यता बचाना चाहते हैं, तो उनके सामने कई कानूनी और व्यावहारिक चुनौतियाँ हैं, जो उनका खेल बिगाड़ सकती हैं:
दो-तिहाई संख्या बल का संकट:
टीएमसी के पास विधानसभा में भारी बहुमत है। ऐसे में उसके दो-तिहाई विधायकों को एक साथ तोड़ना किसी भी बागी गुट के लिए बेहद मुश्किल काम है। अगर संख्या 2/3 से कम रही, तो दल-बदल कानून के तहत सभी बागी विधायकों की कुर्सी जाना तय है।
स्पीकर की शक्तियाँ:
दल-बदल के मामले में अंतिम फैसला लेने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) के पास होता है। जब तक स्पीकर फैसला नहीं लेते, तब तक प्रक्रिया लटकी रह सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद अब स्पीकर को एक निश्चित समय सीमा के भीतर फैसला करना होता है। चूंकि वर्तमान स्पीकर सत्तापक्ष से जुड़े हैं, इसलिए बागियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की तलवार हमेशा लटकी रहेगी।
उपचुनाव का डर:
यदि बागियों को अयोग्य घोषित कर दिया जाता है, तो उनकी सीटें खाली हो जाएंगी और वहां उपचुनाव (By-elections) कराने होंगे। उपचुनाव में दोबारा जीत दर्ज करना और जनता के बीच दल-बदल को सही ठहराना बागियों के लिए बहुत बड़ी चुनौती होती है।
अतीत के उदाहरण और कानूनी दांवपेच:
पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहले भी ऐसे मामले आ चुके हैं, जहां चुनाव जीतने के बाद नेताओं ने पाला बदला। अक्सर बागी नेता तकनीकी रूप से पार्टी के भीतर ही रहने का दावा करते हैं ताकि कागजों पर दल-बदल साबित न हो सके। लेकिन अगर मूल पार्टी व्हिप जारी कर दे या उनके खिलाफ पुख्ता सबूत (जैसे दूसरी पार्टी के मंच पर जाना, सदस्यता पर्ची आदि) स्पीकर के सामने पेश कर दे, तो बचाव की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
नियमों के मुताबिक, बिना दो-तिहाई बहुमत के बगावत करना आत्मघाती साबित हो सकता है। यदि बागी विधायक कानूनी रूप से खुद को सुरक्षित करने में नाकाम रहते हैं, तो न सिर्फ उनकी विधायकी जाएगी, बल्कि उनका राजनीतिक भविष्य भी अधर में लटक सकता है।
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