चंद्रबाबू नायडू की “जनसंख्या प्रोत्साहन” योजना पर भड़कीं बृंदा करात, कह दी बड़ी बात
नई दिल्ली। आंध्र प्रदेश की चंद्रबाबू नायडू सरकार द्वारा राज्य में जन्म दर बढ़ाने के लिए घोषित की गई ‘पॉपुलेशन इंसेंटिव’ (जनसंख्या प्रोत्साहन) योजना पर देश में एक नया राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया है। मुख्य विपक्षी दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) की वरिष्ठ नेता और पोलित ब्यूरो सदस्य बृंदा करात ने इस योजना को लेकर मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू पर तीखा हमला बोला है।
एक साक्षात्कार में अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए सीपीएम नेता ने कहा कि सरकार का यह कदम बेहद निंदनीय है क्योंकि यह सीधे तौर पर महिलाओं की स्वायत्तता और उनके निजी स्पेस (पर्सनल चॉइस) में राज्य सरकार की तरफ से एक अनुचित दखल है।
उन्होंने मुख्यमंत्री को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि मूल रूप से आप जो कर रहे हैं, वह महिलाओं की कोख और उस पर उनके अधिकारों को हथियाने जैसा है। कोई महिला एक बच्चा चाहती है, दो चाहती है या फिर बच्चे पैदा ही नहीं करना चाहती, यह पूरी तरह उसका अपना निजी निर्णय होना चाहिए, लेकिन सरकार वित्तीय लालच देकर इस स्वतंत्रता को प्रभावित कर रही है।
बृंदा करात ने इस नीति के सामाजिक और घरेलू दुष्प्रभावों की ओर इशारा करते हुए कहा कि हमें जमीनी स्तर पर उस गरीब महिला के दृष्टिकोण से सोचना चाहिए जिसके पास पहले से दो बच्चे हैं और वह आगे और बच्चे नहीं चाहती। अब सरकार द्वारा तीसरे बच्चे के जन्म पर 30,000 रुपये और चौथे बच्चे पर 40,000 रुपये देने के इस लालच के कारण उस महिला पर उसके अपने ही परिवार और ससुराल पक्ष की ओर से गर्भधारण करने का भारी दबाव बनाया जाएगा।
सीपीएम नेता ने यह भी दावा किया कि भले ही सरकार यह प्रोत्साहन राशि सीधे महिलाओं के बैंक खातों में ट्रांसफर करने की बात कहे, लेकिन हमारे सामाजिक ढांचे में व्यावहारिक रूप से उस पैसे पर महिलाओं का कोई नियंत्रण नहीं होगा और उनका केवल शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न ही बढ़ेगा। उन्होंने इसे महिलाओं के अधिकारों का खुला उल्लंघन करार दिया।
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यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने श्रीकाकुलम जिले के नरसन्नपेटा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए राज्य में गिरते सकल प्रजनन दर (TFR) को थामने के लिए इस नई नकद प्रोत्साहन योजना का आधिकारिक ऐलान किया। मुख्यमंत्री का तर्क है कि आंध्र प्रदेश में प्रजनन दर गिरकर 1.5 पर आ गई है, जो कि आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी 2.1 के मानक स्तर से काफी कम है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस ट्रेंड को तुरंत नहीं बदला गया, तो आने वाले समय में राज्य में युवाओं की संख्या तेजी से घटेगी और बुजुर्गों की आबादी बढ़ने से राज्य की अर्थव्यवस्था और कार्यबल पर बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
इस नीति को लागू करने के पीछे दक्षिणी राज्यों की एक बड़ी राजनीतिक चिंता यह भी है कि भविष्य में होने वाले लोकसभा सीटों के परिसीमन में कम आबादी वाले राज्यों को अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी या सीटें खोने का डर सता रहा है, भले ही केंद्र सरकार ने इसके लिए मौखिक आश्वासन दिए हों। बहरहाल, चंद्रबाबू नायडू की इस ‘फैमिली प्लानिंग’ से ‘पापुलेशन केयर’ की ओर मुड़ने वाली नीति ने देश में जनसंख्या, महिला अधिकार और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है।
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