ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट में केस: सभी चुनावी आदेशों को रद्द करने की अपील
नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कुछ मनमाने और विवादित फैसलों के खिलाफ अब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुंचे गया है। वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है।
इस याचिका में मांग की गई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके साथ जुड़े अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कदम उठाए जाएं। इसके साथ ही, उनके द्वारा हाल ही में लिए गए ऐसे सभी विवादित फैसलों को पूरी तरह से रद्द किया जाए।
याचिकाकर्ता ने 23 सितंबर को एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित हुई रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह कदम उठाया है।
इस याचिका में केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, कैबिनेट सचिव, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और निर्वाचन आयोग की आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना को प्रतिवादी बनाया गया है।
याचिका में आयोग के भीतर सामने आए प्रशासनिक मतभेदों और फैसलों की कानूनी वैधता पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।
फॉर्म-6 में बदलाव पर रार
याचिका के मुख्य बिंदुओं के अनुसार, नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच चुनाव आयुक्तों डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े कई नीतिगत फैसलों पर 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
याचिका में मुख्य रूप से फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को चुनौती दी गई है, जिसके तहत नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जोड़ा गया था।
याचिकाकर्ता का दावा है कि वैधानिक फॉर्म में यह बदलाव बिना किसी आवश्यक कानूनी प्रक्रिया के किया गया था, जिसे दोनों चुनाव आयुक्तों ने अनधिकृत और गैर-कानूनी करार दिया था।
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इसके अलावा, याचिका में ‘ईसीनेट’ (ECINet) सॉफ्टवेयर के माध्यम से मतदाता डेटा के केंद्रीकरण पर भी कड़ा एतराज जताया गया है।
याचिका में कहा गया है कि कानून के मुताबिक वोटर लिस्ट तैयार करने और उसमें संशोधन करने की मुख्य जिम्मेदारी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) की होती है, लेकिन दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के आईटी विभाग द्वारा डेटा और सॉफ्टवेयर पर नियंत्रण बढ़ाए जाने से स्थानीय अधिकारियों के अधिकार प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं।
याचिका में गोवा के 97 योग्य मतदाताओं का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए दावा किया गया है कि सॉफ्टवेयर में ‘रोलबैक’ की सुविधा न होने के कारण अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद इन वैध मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं किए जा सके।
साथ ही, पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान न्यायिक अधिकारियों द्वारा नागरिकों के नाम वोटर लिस्ट में जोड़े जाने का जिक्र करते हुए कहा गया है कि चुनाव आयोग ने उन 16.10 लाख स्वीकृत नामों को खारिज करने के लिए अपील ट्रिब्यूनल में याचिकाएं दायर कर दीं, जिन्हें दोनों चुनाव आयुक्तों ने बिना आधिकारिक मंजूरी के उठाया गया कदम बताया है।
इस अर्जी में मांग की गई है कि नियमों को ताक पर रखकर लिए गए सभी एकतरफा फैसलों को तुरंत रद्द किया जाए। फॉर्म-6 को दोबारा उसके पुराने रूप में लाया जाए और पश्चिम बंगाल में आई 16 लाख से ज्यादा अपीलों को खारिज किया जाए।
पूरे देश में करीब 13 करोड़ वोटरों के नाम लिस्ट से कटने की बड़ी शिकायत पर कोर्ट के रिटायर्ड जज की देखरेख में एक विशेष जांच टीम बनाने की अपील की गई है। यह टीम तकनीकी एक्सपर्ट्स के साथ मिलकर चुनाव आयोग के इसीनेट और ERONet सॉफ्टवेयर डेटा की फॉरेंसिक जांच करेगी।
इसके अलावा, लापरवाही बरतने वाले दोषी अफसरों के खिलाफ कानून की धारा 32 के तहत कड़ी कार्रवाई करने की बात भी कही गई है।
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