2007 जामिया नगर दंगा मामले में पूर्व विधायक आसिफ खान के खिलाफ आरोप तय
नई दिल्ली। दिल्ली की एक अदालत ने ओखला से पूर्व कांग्रेस विधायक आसिफ मोहम्मद खान के खिलाफ साल 2007 के एक पुराने मामले में दंगा भड़काने, सरकारी काम में बाधा डालने और पुलिसकर्मियों पर हमला करने के गंभीर आरोपों के तहत आरोप तय कर दिए हैं।
जामिया नगर और सरिता विहार इलाके से जुड़े इस बेहद पुराने और हाई-प्रोफाइल मामले में कोर्ट के इस फैसले के बाद पूर्व विधायक की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर साल 2007 का यह पूरा विवाद क्या था और कोर्ट ने किन धाराओं के तहत आरोप तय किए हैं।
क्या है 2007 का जामिया नगर-सरिता विहार मामला?
यह मामला सितंबर 2007 का है। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, दिल्ली के सरिता विहार और जामिया नगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले इलाके में स्थानीय लोगों और पुलिस के बीच भारी गतिरोध पैदा हो गया था। आरोप है कि तत्कालीन स्थानीय नेता आसिफ मोहम्मद खान ने एक बड़ी भीड़ का नेतृत्व किया था, जो हिंसक हो गई थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस प्रदर्शन के दौरान न केवल सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, बल्कि भीड़ ने ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारियों और कर्मियों को घेरकर उन पर हमला किया था। इस मामले में पुलिस ने आसिफ मोहम्मद खान और उनके कई सहयोगियों के खिलाफ दंगा करने और पुलिस टीम पर हमला करने के आरोप में एफआईआर (FIR No. 696/2007) दर्ज की थी।
कोर्ट ने किन गंभीर धाराओं में तय किए आरोप?
लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया और गवाहों के बयानों को देखने के बाद, दिल्ली की साकेत/राउज एवेन्यू कोर्ट (संबंधित मजिस्ट्रेट कोर्ट) ने पूर्व विधायक के खिलाफ प्रथम दृष्टया सबूत पाते हुए निम्नलिखित धाराओं में मुकदमा चलाने का आदेश दिया है:
IPC की धारा 147 और 148: दंगा फसाद करना और घातक हथियारों के साथ दंगे में शामिल होना।
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IPC की धारा 186 और 353: लोक सेवक (Public Servant) के सरकारी काम में बाधा डालना और उन्हें डराने या रोकने के लिए आपराधिक बल का प्रयोग करना।
IPC की धारा 332: ड्यूटी पर तैनात लोक सेवक को जानबूझकर चोट या चोट पहुंचाने की कोशिश करना।
IPC की धारा 120B: इस पूरे घटनाक्रम और पुलिस पर हमले की आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) रचना।
सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम: सरकारी और सार्वजनिक संपत्तियों को तोड़फोड़ कर नुकसान पहुंचाना।
क्या होता है आरोप तय होने का मतलब?
कानूनी प्रक्रिया में ‘आरोप तय’ होना एक बेहद महत्वपूर्ण चरण है। इसका मतलब है कि कोर्ट ने माना है कि आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त शुरुआती सबूत मौजूद हैं। अब इस मामले में नियमित ट्रायल शुरू होगा, जहां गवाहों के बयान दर्ज किए जाएंगे और जिरह होगी।
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