माधुरी-तृप्ति की ‘मां बहन’: कमियों के बावजूद बांधे रखती है यह डार्क-कॉमेडी

माधुरी-तृप्ति की ‘मां बहन’: कमियों के बावजूद बांधे रखती है यह डार्क-कॉमेडी

माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी की फिल्म ‘मां बहन’ रिलीज हो चुकी है। फिल्म देखने से पहले पढ़िए ये रिव्यू और जानिए कैसी है माधुरी की नई फिल्म…

मुंबई: सुरेश त्रिवेणी के निर्देशन में बनी डार्क-कॉमेडी फिल्म ‘मां बहन’ समाज की रूढ़िवादी सोच पर चोट करते हुए मनोरंजन का एक नया ताना-बाना बुनती है। कहानी के केंद्र में रेखा (माधुरी दीक्षित) हैं, जो एक विधवा महिला हैं।

समाज की परवाह न कर सजने-संवरने, खुलकर बोलने और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने के कारण वह पूरी कॉलोनी की नजरों में खटकती हैं।

रेखा की बड़ी बेटी जया (तृप्ति डिमरी) अपनी निजी जिंदगी और आईवीएफ के लिए साढ़े पांच लाख रुपये के आर्थिक दबाव से जूझ रही है, जबकि छोटी बेटी सुषमा (धारणा दुर्गा) अपनी अलग उलझनों में है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब रेखा के घर पर अचानक गुप्ताजी (रवि किशन) की रहस्यमयी मौत हो जाती है।

रेखा इसे एक हादसा बताती है, लेकिन पुलिस को बुलाने के बजाय मां-बेटियां खुद ही इस मुसीबत को संभालने का फैसला करती हैं।

हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब ठीक सामने गुप्ताजी के घर में उनकी बेटी की सगाई का जश्न चल रहा होता है और मेहमानों की आवाजाही लगी रहती है।

इसके बाद शुरू होता है झूठ, गलतफहमियों और लगातार बिगड़ते हालातों का एक ऐसा दौर, जो दर्शकों को हंसाने के साथ-साथ बांधे रखता है।

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकारों का अभिनय है। माधुरी दीक्षित ने एक अरसे बाद पर्दे पर बिना किसी नाटकीयता के मजेदार और भावुक रेखा के किरदार को जीवंत किया है।

वहीं, तृप्ति डिमरी ने बिना भारी-भरकम संवादों के भी जया की बेचैनी, झुंझलाहट और थकान को बेहद प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारा है।

धारणा दुर्गा की एनर्जी और रवि किशन का अंदाज कहानी में जान फूंकता है, हालांकि परेश रावल का छोटा सा किरदार थोड़ा अधूरा लगता है।

गीतांजलि कुलकर्णी, अरुणोदय सिंह और जतिन सरना ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने बिना किसी उपदेश के समाज की खोखली सोच और एक आत्मनिर्भर विधवा महिला के प्रति लोगों के नजरिए पर गहरा तंज कसा है।

फिल्म का डार्क ह्यूमर कई जगह बेहतरीन बन पड़ा है, खासकर तब जब तीनों महिलाएं हालात सुलझाने के चक्कर में उन्हें और उलझा देती हैं।

हालांकि, इंटरवल के बाद फिल्म की पटकथा थोड़ी धीमी और खिंची हुई महसूस होती है, जिससे कुछ सामाजिक मुद्दे अपनी गहराई खो देते हैं।

इसके बावजूद, कमजोर स्क्रीनप्ले को माधुरी और तृप्ति की शानदार जुगलबंदी संभाल लेती है।

कुल मिलाकर, कुछ कमियों के बाद भी अपनी अनूठी कहानी और बेहतरीन अभिनय के दम पर यह फिल्म भीड़ से अलग नजर आती है और अंत तक दर्शकों का मनोरंजन करने में सफल रहती है।


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Raja Zaid

"राजा ज़ैद एक जाने-माने पत्रकार हैं। उन्हें देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ राजनीति और सामायिक विषयो की कवरेज का 15 वर्षो से अधिक का अनुभव है।