ममता को मिला ‘फुटबॉल खिलाडी’, जाने बागी गुट को आयोग ने कौन सा निशान थमाया
नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दोनों गुटों के आपसी विवाद को देखते हुए उन्हें एक अस्थायी नाम और चुनाव निशान जारी कर दिए है। पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मुख्य गुट को अब आधिकारिक तौर पर ममता अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नाम से जाना जाएगा और आगामी उपचुनावों के लिए उन्हें फुटबॉल खिलाडी का नया चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। चुनाव आयोग का यह फैसला अंतिम निर्णय आने तक दोनों पक्षों पर लागु रहेगा।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और आयुक्तों विवेक जोशी व सुखबीर सिंह संधू की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष 12 सितंबर के बाद गुरुवार को नई दिल्ली में ऋतब्रत बनर्जी और ममता बनर्जी के प्रतिनिधियों की अलग-अलग सुनवाई हुई।
जिसके तहत आयोग के 14 पन्नों के अंतरिम आदेश के मुताबिक शुक्रवार सुबह 11 बजे तक दोनों पक्षों को मूल पार्टी से जुड़ा कोई दिखने वाला शब्द या चिह्न रखते हुए तीन अस्थायी नाम और मुफ्त चिह्नों की सूची से तीन विकल्प देने के निर्देश दिए गए थे और यह अंतरिम इंतजाम अंतिम फैसला आने तक दोनों गुटों को बराबर मौका देने व उनके अधिकार सुरक्षित रखने के लिए किया गया है।
नामांकन का टकराव; बागी गुट को मिला ‘लिफाफा’ निशान
क्योंकि दोनों गुटों के उम्मीदवारों ने पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम व रेजीनगर तथा असम की नगांव संसदीय सीट पर होने वाले उपचुनावों के लिए टीएमसी के नाम पर टकराव वाले फॉर्म-बी के साथ नामांकन दाखिल किए थे, जिसके परिणामस्वरूप ऋतब्रत बनर्जी से जुड़े प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया गया।
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जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने शुक्रवार को निर्वाचन आयोग को भेजे गए अपने विकल्पों में क्रिकेट बैट, बिना गेंद वाले फुटबॉलर के चिह्न के अलावा ‘अखिल भारतीय तृणमूल ममता कांग्रेस’, ‘अखिल भारतीय ममता तृणमूल कांग्रेस’ और ‘ममता तृणमूल कांग्रेस’ जैसे तीन नाम सुझाए हैं।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग के इस कदम की कड़ी निंदा करते हुए भारतीय जनता पार्टी और आयोग के बीच सांठगांठ होने का सीधा आरोप लगाया है। उनका कहना है की ये दोनों संस्थाएं मिलकर विपक्षी पार्टियों को जानबूझकर कमजोर करने का काम कर रही है। राहुल गांधी ने पार्टी के नाम और निशान को छीनने की इस घटना को पार्टी चोरी का नाम दिया और इसे देश के लोकतंत्र के गिरते स्तर का एक नया और खतनाक उदाहरण बताया।
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