पीएम 5 देशो के दौरे पर तो राजनाथ 2 देशो के दौरे पर, नसीहत सिर्फ जनता को?

पीएम 5 देशो के दौरे पर तो राजनाथ 2 देशो के दौरे पर, नसीहत सिर्फ जनता को?

संपादकीय

ब्यूरो (राजा ज़ैद)। पीएम नरेंद्र मोदी 5 देशों के अपने दौरे पर विदेश में हैं। पीएम मोदी ने अपना विदेश दौरा शुरू होने से पहले देश की जनता को कुछ नसीहतें की थीं। वैश्विक आर्थिक संकट और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव को लेकर की गई इन नसीहतों में जनता से फिजूलखर्ची रोकने, गैर-जरूरी विदेश यात्राओं से बचने, सोना न खरीदने और रसोई में खाद्य तेल व ईंधन के सीमित इस्तेमाल जैसी अपीलें शामिल थीं। प्रधानमंत्री का तर्क था कि वैश्विक मंदी के इस दौर में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत रखने के लिए हर नागरिक को ‘मितव्ययिता’ (Austerity) अपनानी होगी।

पीएम मोदी की इन नसीहतों पर देश की मध्यमवर्गीय जनता ने हमेशा की तरह एक सकारात्मक और त्यागी रुख दिखाया। देश की राजधानी दिल्ली समेत कई महानगरों में आम नागरिकों ने पेट्रोल-डीजल बचाने के लिए कारपूल का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, त्योहारों पर सोने की खरीदारी सीमित कर दी और रसोई के बजट में कटौती कर ली। लेकिन यहाँ एक बड़ा और बुनियादी सवाल यह उठता है कि—क्या त्याग, तपस्या और नसीहतें सिर्फ आम जनता के हिस्से में ही आती हैं? क्या सरकार, नौकरशाही और सत्तारूढ़ दल के नेता भी प्रधानमंत्री की इन नसीहतों को अपने व्यावहारिक जीवन में उतार रहे हैं?

पीएम मोदी के विदेश रवाना होने के तुरंत बाद खबर आई कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी दो देशों के चार दिवसीय दौरे पर प्रस्थान कर गए हैं। वे वियतनाम और साउथ कोरिया के आधिकारिक दौरे पर निकले हैं। तय कार्यक्रम के मुताबिक, वे 18 से 19 मई तक वियतनाम में रहेंगे और 19 मई को ही वियतनाम से साउथ कोरिया के लिए रवाना होंगे, जहाँ से 21 मई को उनकी दिल्ली वापसी होगी।

वियतनाम दौरे पर रवाना होने से पहले अपने सोशल मीडिया ‘X’ पर एक पोस्ट में राजनाथ सिंह ने कहा, “मैं रणनीतिक सैन्य सहयोग को गहरा करने, रक्षा औद्योगिक साझेदारी को मजबूत करने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने वाले समुद्री सहयोग को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करूंगा।”

निश्चित रूप से, वैश्विक स्तर पर भारत की कूटनीतिक और सामरिक स्थिति को मजबूत करने के लिए राष्ट्रप्रमुखों और मंत्रियों के विदेशी दौरे बेहद जरूरी हैं। इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन विरोधाभास तब पैदा होता है, जब एक तरफ देश की जनता को आर्थिक संकट का हवाला देकर “कम खर्च” करने का पाठ पढ़ाया जाता है, और दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर होने वाले वीआईपी दौरों, बड़े आयोजनों और प्रशासनिक तामझाम के खर्चों में कोई कटौती नहीं दिखती।

विडंबना देखिए, पीएम मोदी की नसीहत के बावजूद जमीनी स्तर पर सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के भी कई ऐसे नेता, मंत्री और जनप्रतिनिधि हैं जो आज भी सड़कों पर एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों गाड़ियों का काफिला लेकर चलते हैं। इन काफिलों में दौड़ने वाली लग्जरी गाड़ियां और उनमें जलने वाला ईंधन क्या देश के संसाधनों पर बोझ नहीं है? प्रधानमंत्री की अपील के शुरुआती एक-दो दिनों में कुछ नेताओं ने हेडलाइंस बटोरने और तस्वीरें खिंचाने के लिए न सिर्फ अपने काफिले छोटे किए, बल्कि कुछ माननीय तो कैमरों के सामने साइकिल चलाते हुए भी नजर आए। लेकिन यह ‘सादगी का नाटक’ चंद घंटों में ही उतर गया। जैसे ही कैमरों की फ्लैश लाइट बंद हुई, वीआईपी संस्कृति (VIP Culture) और हूटर बजाते बड़े-बड़े काफिले फिर से सड़कों पर शान से दौड़ने लगे।

लोकतंत्र में जनता और सरकार के बीच का रिश्ता विश्वास और बराबरी पर टिकता है। जब देश की अर्थव्यवस्था संकट में हो, तो पहला त्याग नेतृत्व की तरफ से दिखना चाहिए। यदि जनता से ईंधन बचाने की अपील की जा रही है, तो मंत्रियों और अधिकारियों के अनावश्यक दौरों तथा उनके सुरक्षा काफिलों में गाड़ियों की संख्या आधी क्यों नहीं की जा सकती? यदि जनता से विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए सोना न खरीदने को कहा जा रहा है, तो राजनीतिक विज्ञापनों और भव्य सरकारी उत्सवों पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये पर लगाम क्यों नहीं कसी जाती?

नसीहतें देना आसान है, लेकिन वे तभी प्रभावी होती हैं जब ‘कथनी और करनी’ में अंतर न हो। अगर सरकार चाहती है कि देश का आम नागरिक संकट के समय में अपनी बेल्ट और कस ले, तो खुद सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को भी सादगी की मिसाल पेश करनी होगी। वरना, जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नियम, अनुशासन और त्याग की हर कसौटी सिर्फ उनके लिए ही बनी है, और रसूखदारों को इस संकटकाल में भी खुली छूट है?


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Raja Zaid

"राजा ज़ैद एक जाने-माने पत्रकार हैं। उन्हें देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ राजनीति और सामायिक विषयो की कवरेज का 15 वर्षो से अधिक का अनुभव है।