उमर और शरजील इमाम को लेकर सुप्रीमकोर्ट ने अपने ही फैसले पर सवाल उठाये

उमर और शरजील इमाम को लेकर सुप्रीमकोर्ट ने अपने ही फैसले पर सवाल उठाये

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के मामलों में जमानत को लेकर बड़ा सिद्धांत प्रतिपादित किया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि चाहे मामला यूएपीए या आतंकवाद से ही क्यों न जुड़ा हो, ‘जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद’।

इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ही एक अन्य पीठ द्वारा जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद और शरजील इमाम को दिल्ली दंगा मामले में जमानत न देने के पुराने फैसले पर गंभीर असहमति और आपत्ति जताई है। अदालत ने माना कि उमर खालिद के मामले में पिछली पीठ ने लंबे समय से जेल में बंद रहने और सुनवाई में हो रही अत्यधिक देरी जैसे बुनियादी संवैधानिक पहलुओं पर ठीक से ध्यान नहीं दिया।

जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने यह ऐतिहासिक टिप्पणी जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए की, जो एक नार्को-टेररिज्म मामले में पिछले पांच वर्षों से बिना किसी ट्रायल के जेल में बंद थे। फैसला सुनाते हुए जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिलने वाला व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार और किसी भी आरोपी को दोषसिद्धि से पहले निर्दोष मानने का सिद्धांत किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूएपीए कानून की धारा 43D(5) में जमानत की शर्तें भले ही कितनी भी सख्त क्यों न हों, लेकिन वे किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल के लिए जेल में रखने का अधिकार नहीं देतीं और ये शर्तें हमेशा संवैधानिक अधिकारों के अधीन ही रहेंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ही अदालत द्वारा जनवरी 2026 में ‘गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य’ (दिल्ली दंगा मामला) में दिए गए फैसले की तीखी आलोचना की, जिसके तहत उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं। पीठ ने कहा कि हमें उस फैसले के दृष्टिकोण को स्वीकार करने में भारी कठिनाई हो रही है।

अदालत ने न्यायिक अनुशासन की याद दिलाते हुए कहा कि साल 2021 में ‘के. ए. नजीब’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी (तीन न्यायाधीशों की) पीठ ने यह स्पष्ट कानून तय किया था कि यदि मुकदमे की सुनवाई में असाधारण देरी हो रही हो, तो यूएपीए के सख्त प्रावधानों के बावजूद आरोपी को जमानत दी जा सकती है। इसके विपरीत, बाद में बनी छोटी पीठों ने उमर खालिद और गुरविंदर सिंह के मामलों में इस बड़े और बाध्यकारी फैसले की अनदेखी की या उसके महत्व को कम कर दिया, जो कि न्यायिक अनुशासन के खिलाफ है। कोई भी छोटी पीठ किसी बड़ी पीठ के तय किए गए कानूनी सिद्धांतों को दरकिनार नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि अगर जांच एजेंसियों द्वारा लगाए गए शुरुआती आरोपों को ही अंतिम सच मानकर आँख बंद करके जमानत खारिज की जाती रही, तो ट्रायल से पहले का यह कारावास एक तरह की सजा का रूप ले लेगा। कानून जितना सख्त होता है, उतनी ही तेजी से उसका ट्रायल पूरा किया जाना चाहिए, न कि मुकदमे की देरी को आरोपी के लिए सजा बना दिया जाए।

देश की सर्वोच्च अदालत की इस नई और बड़ी टिप्पणी के बाद अब यह साफ हो गया है कि लंबे समय से बिना ट्रायल के जेलों में बंद यूएपीए के आरोपियों के लिए जमानत के रास्ते आसान हो सकते हैं, और आने वाले दिनों में उमर खालिद व शरजील इमाम जैसे आरोपियों की कानूनी टीम इस फैसले के आधार पर दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है।

बता दें कि उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद दिल्ली दंगों के आरोप में 5 साल 3 महीने से तिहाड़ जेल में बंद हैं।


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Raja Zaid

"राजा ज़ैद एक जाने-माने पत्रकार हैं। उन्हें देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ राजनीति और सामायिक विषयो की कवरेज का 15 वर्षो से अधिक का अनुभव है।