पीएम मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन: कहां हुई चूक? विपक्ष क्यों उठा रहा सवाल
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कल रात 8. 30 बजे किये गए राष्ट्र के नाम संबोधन की स्क्रिप्ट पर सिर्फ विपक्ष ही नहीं बल्कि राजनीतिक विश्लेषक भी हैरानी जता रहे हैं। दरअसल पीएम मोदी ने अपने भाषण में विपक्ष को इसलिए कटघरे में खड़ा किया क्यों कि उसने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास नहीं होने दिया।
पीएम मोदी ने अपने भाषण में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके का नाम लेकर उन्हें सीधे तौर पर महिला विरोधी करार दिया। करीब 28 मिनट के अपने संबोधन में पीएम ने कहा, “कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियों की स्वार्थी राजनीति का नुक़सान देश की नारी शक्ति को उठाना पड़ा है।”
जबकि शुक्रवार को 131वां संविधान संशोधन बिल पेश हुआ था। इस बिल का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभाओं में 33 फ़ीसदी महिला आरक्षण से जुड़े क़ानून को लागू करना, 2026 से पहले की जनगणना के आधार पर सीटों के परिसीमन की इजाज़त देना और लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करना था।
विश्लेषकों का कहना है कि पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कांग्रेस के साथ डीएमके और तृणमूल कांग्रेस का नाम लिया क्यों कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव होना बाकी है और डीएमके और तृणमूल कांग्रेस अपने अपने राज्यों की सरकार में हैं और दोनों ही राज्यों में ये दल बीजेपी पर भारी साबित हो रहे हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पीएम मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन पर सवाल दागे हैं। उन्होंने कहा कि “प्रधानमंत्री ने अपने संविधान संशोधन बिल को लोकसभा से पारित न करा पाने के लिए माफी मांगी है। लेकिन वास्तव में उन्हें महिलाओं के नाम पर परिसीमन के एक कुटिल प्रस्ताव को ज़बरदस्ती पारित कराने के अपने बेशर्मी और कपट से भरे प्रयासों के लिए माफी मांगनी चाहिए थी। इस पूरे मामले में उनकी नीयत साफ नहीं, स्पष्ट रूप से खोटी है। अगर उनकी नीयत को समझना हो, तो यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’, जो सितंबर 2023 में सर्वसम्मति से पास हो गया था, उसे 30 महीने की देरी के बाद 16 अप्रैल 2026 की देर रात को अधिसूचित क्यों किया गया। उनके जीवन भर के आचरण को देखते हुए, महिला सम्मान की उनकी बातें पूरी तरह से पाखंड लगती हैं।”
प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री के रूप में बोल रहे हैं या बीजेपी के नेता के रूप में?
राज्य सभा सांसद और देश के नामी वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि “मैंने प्रधानमंत्री का भाषण सुना और मैं यह सोच रहा था कि प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री के रूप में बोल रहे हैं या संसद में बीजेपी के नेता के रूप में? प्रधानमंत्री के पीछे राष्ट्रीय झंडा था और वह भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर बोल रहे थे, जबकि चुनाव चल रहा है। यह भारत की राजनीति में एक नया निम्न स्तर है लेकिन मुझे पता है कि न तो मुख्य चुनाव आयुक्त और न ही कोई अन्य संस्था इस पर कुछ करेगी।”
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कई तथ्य गलत:
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पीएम मोदी के संबोधन में पेश किये गए कई तथ्यों को सिरे से नकारते हुए उन्हें झूठा करार दिया है।
उन्होंने सोशल साइट एक्स पर अपने पोस्ट में कहा कि “प्रधानमंत्री के तमाम हास्यास्पद दावों में एक यह भी था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जन धन-आधार-मोबाइल और जीएसटी का विरोध किया था। जबकि ये दोनों ही कांग्रेस की देन है। इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर सार्वभौमिक बैंकिंग की नींव रखी।”
कांग्रेस नेता ने कहा कि “आधार योजना को 29 सितंबर 2010 को महाराष्ट्र के नंदुरबार ज़िले से डॉ. मनमोहन सिंह ने शुरू किया था। भारत की डिजिटल क्रांति राजीव गांधी की सोच और प्रयासों से संभव हुई। जीएसटी को भी डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने आगे बढ़ाया था, लेकिन तब गुजरात के एक पूर्व मुख्यमंत्री के विरोध के कारण यह पास नहीं हो सका। उसी मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 और मनरेगा का भी विरोध किया था, जो कोविड-19 महामारी के दौरान करोड़ों लोगों के लिए सहारा बने। प्रधानमंत्री को झूठ बोलने की बीमारी है। आज भी उन्होंने यही साबित किया है।”
कांग्रेस की मांग:
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि कांग्रेस ने महिला आरक्षण विधेयक का हमेशा समर्थन किया है और कांग्रेस की वजह से ये 2010 में राज्यसभा में पास हुआ था। खड़गे ने मांग की है कि 2023 के क़ानून के आधार पर ही 543 सीटों पर महिलाओं को आरक्षण दिया जाना चाहिए।
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