सुप्रीम कोर्ट से प्रदर्शनकारियों को राहत FIR पर रोक और सात राज्यों को नोटिस
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शन था, लेकिन इसमें कुछ उपद्रवी भी शामिल हो गए थे। दूसरी तरफ पुलिसकर्मियों के परिवारों की तरफ से भी याचिकाएं दाखिल कर उन पर हमले के आरोप लगाए गए हैं
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक बड़ी सुनवाई हुई। यह सुनवाई कॉकरोच जनता पार्टी के बुलावे पर छात्रों द्वारा किये गए संसद मार्च और उस दौरान पुलिस द्वारा की गयी लाठीचार्ज व् सख्त कार्यवाई के खिलाफ दायर अर्जिया (याचिकाओं) पर थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने बताया कि यह मामला सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश, नागपुर और बिहार में भी ऐसी घटनाएं हुई हैं।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पैलेट गन के इस्तेमाल, इलेक्ट्रिक बैटन, नाबालिगों की हिरासत और सिविल ड्रेस में पुलिस द्वारा हिंसा जैसे गंभीर आरोपों पर सख्त टिप्पणी करते हुए स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच की बात कही। राहत देते हुए कोर्ट ने फिलहाल एफआईआर पर दंडात्मक कार्रवाई न करने का निर्देश दिया और केंद्र समेत सात राज्यों को नोटिस जारी किया।
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याचिकाकर्ताओं के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान 19 साल के एक लड़के की आंखों की रोशनी पैलेट गन से जाने, एक युवती के आईसीयू में भर्ती होने, वकीलों व मीडियाकर्मियों पर हमले और बिना वर्दी के पुलिसकर्मियों द्वारा हिंसा जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शन था, लेकिन इसमें कुछ उपद्रवी भी शामिल हो गए थे। दूसरी तरफ पुलिसकर्मियों के परिवारों की तरफ से भी याचिकाएं दाखिल कर उन पर हमले के आरोप लगाए गए हैं।
वरिष्ठ वकीलों—शादान फरासत, प्रशांत भूषण, श्याम दीवान और वृंदा ग्रोवर ने वीडियो फुटेज, नाबालिगों की हिरासत, मसूरी हाईवे पर एक युवक को छोड़े जाने की घटना और जंतर-मंतर पर कथित रूप से पत्थरों से भरे ट्रक के प्रवेश जैसे कई गंभीर मुद्दे उठाए। अंत में, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि स्वतंत्र जांच की स्पष्ट जरूरत है और इसके लिए एक उच्च स्तरीय समिति या एसआईटी का गठन किया जाएगा।
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