तमिलनाडु में RSS मार्च को हरी झंडी; कोर्ट ने कहा- पुराने बहाने बनाकर बार-बार न रोकें
नई दिल्ली: मद्रास हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को तमिलनाडु में रूट मार्च निकालने की मंजूरी दे दी है। अदालत ने पुलिस द्वारा बार-बार अनुमति रोकने पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट का कहना था कि पुलिस उन्हीं पुराने बहानों का हवाला दे रही है, जिन्हें पहले ही खारिज किया जा चुका है।
न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि बिना किसी ठोस और नए कारण के शांतिपूर्ण आयोजन को नहीं रोका जा सकता। अदालत के इस फैसले के बाद अब राज्य में तय तारीखों पर आरएसएस का मार्च निकालने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
मद्रास हाईकोर्ट ने शुक्रवार, 16 अक्तूबर को आरएसएस के रूट मार्च और जनसभा की अनुमति से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस अधिकारियों को 19 अक्तूबर तक प्रस्तावित मार्च के समय, मार्ग और स्थान तय करने का निर्देश दिया है।
याचिका दायर करने का कारण
यह याचिका उत्तर तमिलनाडु के आरएसएस राज्य सचिव वी. जी. जगदीशन की ओर से दायर की गई थी, जिसमें पुलिस द्वारा 18 अक्तूबर, 25 अक्तूबर, 1 नवंबर या अन्य तारीखों पर वर्दी पहनकर और बैंड के साथ मार्च निकालने की अनुमति देने से इनकार करने को चुनौती दी गई थी।
याचिका में कहा गया कि देश के अन्य हिस्सों में ऐसे मार्च निकाले जाते हैं, लेकिन तमिलनाडु में 2022 से अनुमति न मिलने के कारण बार-बार अदालत का रुख करना पड़ रहा है।
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न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने पुलिस के उस आदेश का जिक्र किया जिसमें दूसरे समुदायों के धार्मिक स्थलों, यातायात में बाधा और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जैसे पुराने कारणों को दोहराया गया था, जिन्हें अदालत पहले ही कमजोर मान चुकी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस ने कोई नया कारण नहीं बताया है और तमिलनाडु पुलिस (सुधार) अधिनियम, 2013 या अन्य कारणों का हवाला देकर आरएसएस के रूट मार्च के अधिकार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने तंज कसते हुए कहा कि पुलिस ने अदालत के दिशा-निर्देशों का उपयोग स्थिति को संभालने के बजाय अनुमति रोकने के लिए किया, और निर्देश दिया कि भविष्य में ऐसे आवेदनों को बार-बार खारिज न किया जाए तथा समय रहते उचित निर्णय लिया जाए।
महाधिवक्ता ने कोर्ट को साफ किया कि स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए पुलिस सुरक्षा के लिहाज से मार्च के रास्तों में कुछ जरूरी बदलाव कर सकती है। अदालत ने इस बात को लिखित में दर्ज करते हुए याचिका को बंद कर दिया। इसका सीधा मतलब यह है कि पुलिस अब स्थानीय कानून-व्यवस्था के हिसाब से फैसला ले सकेगी। इस सहमति के साथ ही कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई पूरी कर दी है।
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