SC की नसीहत: निर्देश व्यवस्था सुधार के लिए आलोचना न समझें हाई कोर्ट

SC की नसीहत: निर्देश व्यवस्था सुधार के लिए आलोचना न समझें हाई कोर्ट

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश की विभिन्न हाई कोर्ट्स में लंबित जमानत याचिकाओं के अंबार पर सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जमानत मामलों में देरी सीधे तौर पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है. शीर्ष अदालत ने सभी हाई कोर्ट्स को निर्देश दिया है कि जमानत याचिकाओं के जल्द निपटारे के लिए नई व्यवस्था लागू की जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने आज सोमवार को कई हाई कोर्ट्स में दाखिल जमानत की अर्जियों का तेजी से निपटारा सुनिश्चित करने के लिए कई सुझाव दिए. साथ ही देश की सबसे बड़ी अदालत ने ऐसे मामलों की लिस्टिंग और सुनवाई के लिए लंबित केसों और बार-बार होने वाली देरी पर चिंता जताई.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच एक केस (सनी चौहान बनाम पंजाब राज्य) की सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने पहले पूरे देश के हाई कोर्ट्स से लंबित जमानत अर्जियों के बारे में जानकारी मांगी थी.

यह देखते हुए कि अधिकतर हाई कोर्ट्स ने जरूरी डेटा दे दिया था और जमानत के मामलों के समय पर निपटारे के लिए पहल की थी, कोर्ट ने फिर भी कुछ अधिकार क्षेत्रों, खासकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित मामलों पर चिंता जताई.

जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा, “हालांकि जानकारी आसानी से उपलब्ध थी, लेकिन हम इसे आदेश में शामिल करना जरूरी नहीं समझते, क्योंकि ज्यादातर हाई कोर्ट्स ने समय पर मामले की निपटारे के लिए पहल की है.”

इलाहाबाद हाई कोर्ट का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “पेंडेंसी बहुत ज्यादा हो गई है.” भले ही जज “एक दिन में सैकड़ों केसों” की सुनवाई करते हों. कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और प्रशासनिक समिति पर यह जिम्मेदारी छोड़ दी कि वे एक ऐसा व्यवस्था बनाएं जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि हर जमानत अर्जी के लिए सुनवाई की एक तय तारीख तय हो. इसके लिए “न्यायिक संसाधनों के मिलाने” का सुझाव भी दिया और निर्देश दिया कि जमानत के मामलों को कॉज़ लिस्ट में प्राथमिकता दी जाए.

बेंच ने यह भी कहा कि पटना हाई कोर्ट में भी इसी तरह की व्यवस्था बनाने की जरूरत है, जहां “जमानत के मामले कभी-कभी महीनों तक टल जाते हैं.” इसी तरह कोर्ट ने कहा कि एक साल पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 63,000 से अधिक जमानत अर्जियों का लंबित होने से “चिंताजनक स्थिति” बन गई थी, साथ ही यह उम्मीद भी जताई कि तब से काफी संख्या में मामलों का निपटारा हो गया होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट करते हुए कहा कि उसकी टिप्पणियों को किसी भी हाई कोर्ट की आलोचना के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, कोर्ट का कहना है कि ये निर्देश व्यवस्था की कार्यक्षमता को मजबूत करने के मकसद से दिए गए थे.

पहली सुनवाई से पहले स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करना अनिवार्य होना चाहिए, और जमानत याचिकाओं की अग्रिम प्रति एडवोकेट जनरल के ऑफिस या नामित सरकारी एजेंसियों को दी जाए. ऐसे तंत्र विकसित किए जाएं जिनसे यह सुनिश्चित हो सके कि नई जमानत अर्जियों को वैकल्पिक दिनों पर, या कम से कम दाखिल करने के एक सप्ताह के भीतर लिस्ट किया जाए, जिसमें केंद्र या राज्य की ओर से अनिवार्य प्रतिनिधित्व हो.


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Raja Zaid

"राजा ज़ैद एक जाने-माने पत्रकार हैं। उन्हें देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ राजनीति और सामायिक विषयो की कवरेज का 15 वर्षो से अधिक का अनुभव है।