दलबदल कानून को सिब्बल की चुनौती: क्या खतरे में है क्षेत्रीय दलों का वजूद?
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने असंवैधानिक दल-बदल और अवैध टूट को रोकने के लिए दो-तिहाई विधायकों के विलय वाले प्रावधान की न्यायिक व्याख्या को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है
नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई राज्यों में बड़े पैमाने पर दल-बदल और राजनीतिक विलय देखने को मिले हैं।
अब वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए उस न्यायिक व्याख्या को चुनौती दी है, जिसके अनुसार दो-तिहाई विधायक किसी अन्य दल में विलय का दावा कर दलबदल कानून से बच सकते हैं।
उनका कहना है कि यह संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक व्यवस्था के विपरीत है।
ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि जो विपक्ष ‘संविधान बचाने’ और उसमें बदलाव न होने देने पर अड़ा है, वह खुद संविधान की दसवीं अनुसूची के प्रावधानों में संशोधन या नई व्याख्या की मांग क्यों कर रहा है।
सत्तर और अस्सी के दशक में भारतीय राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ की संस्कृति यानी सत्ता हासिल करने के लिए बार-बार दल बदलने की प्रवृत्ति चरम पर थी।
इस पर रोक लगाने के उद्देश्य से 1985 में राजीव गांधी की सरकार द्वारा 52वें संविधान संशोधन के जरिए भारतीय संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई।
इस कानून के तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ता है या पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 102(2) और 191(2) भी इसी व्यवस्था को लागू करते हैं।
हालांकि, इस कानून के पैरा 4 में राजनीतिक दलों के विलय को लेकर एक अपवाद रखा गया, जिसके अनुसार यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय कर लेते हैं, तो उसे दल-बदल नहीं माना जाएगा।
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यही अपवाद आज सबसे बड़ा विवाद बन चुका है और विशेषज्ञों का मानना है कि इसका इस्तेमाल कर कई राजनीतिक दलों में टूट और विलय को वैध ठहराया जा रहा है।
कपिल सिब्बल ने व्यक्तिगत रूप से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया है कि दसवीं अनुसूची के पैरा 4 की वर्तमान न्यायिक व्याख्या दलबदल को रोकने के बजाय उसे एक वैध रास्ता मुहैया करा रही है।
उनका मानना है कि केवल दो-तिहाई विधायक किसी दूसरे दल में शामिल होकर तब तक विलय का दावा नहीं कर सकते, जब तक कि मूल राजनीतिक दल स्वयं संगठनात्मक स्तर पर विलय का निर्णय न ले।
इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने शीर्ष अदालत से इस पर स्पष्ट संवैधानिक व्याख्या करने और मामले को एक बड़ी पीठ के समक्ष सुनने की मांग की है।
हाल के वर्षों में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गोवा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में विधायकों के बड़े समूहों ने इसी प्रावधान का सहारा लेकर दूसरे दलों का दामन थामा है, जिससे न केवल राजनीतिक संकट पैदा हुआ बल्कि कई दलों के वजूद पर भी खतरा मंडराने लगा।
यही कारण है कि क्षेत्रीय दलों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं और उन्हें डर है कि यदि यह व्याख्या जारी रही, तो उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों को संगठित तरीके से दूसरी पार्टियों में ले जाना आसान हो जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कपिल सिब्बल की याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जता दी है।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न खड़े हैं—जैसे, क्या मूल राजनीतिक दल और विधायी दल को एक समान माना जा सकता है? क्या दो-तिहाई विधायकों का समर्थन ही वैध राजनीतिक विलय माना जाना चाहिए? क्या वर्तमान व्याख्या दलबदल कानून के मूल उद्देश्य को विफल कर रही है? और क्या स्पीकर द्वारा ऐसे विलयों को मान्यता देना संवैधानिक रूप से सही है?
यदि सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर कोई नई व्याख्या देता है, तो यह संसद और देश की सभी राज्य विधानसभाओं की राजनीति के लिए एक नया संवैधानिक मानदंड तय करेगा।
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