बॉम्बे हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: शांतिपूर्ण आंदोलन हर नागरिक का बुनियादी हक
महाराष्ट्र: बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन पुलिस कार्रवाई को रोकने वाला कोई भी व्यापक आदेश देने से पहले आंदोलनकारियों की पृष्ठभूमि और आम जनता को होने वाली परेशानियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार को उन याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा लोगों को अवैध रूप से हिरासत में लेने का आरोप लगाया गया है।
अदालत वकील सावर देवरे की जनहित याचिका (पीआईएल) और वकील गायत्री सिंह द्वारा दायर चार हिरासत में लिए गए लोगों के आवेदन पर सुनवाई कर रही थी।
याचिका में दिल्ली के प्रदर्शनों के समर्थन में महाराष्ट्र में हो रहे शांतिपूर्ण आंदोलनों पर पुलिस बर्बरता रोकने और भविष्य में किसी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को हिरासत में न लेने की सख्त मांग की गई है।
अवैध हिरासत और नजरबंदी का आरोप
सिंह ने बताया कि इन चारों को पूरे एक दिन तक हिरासत में रखा गया, फिर घर जाने को कहा गया, और बाद में उन्हें ‘हाउस अरेस्ट’ (नजरबंद) कर दिया गया। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील मिहिर देसाई ने दो अन्य लोगों के हलफनामे पेश किए, जिन्हें पुलिस ने उनके घरों से हिरासत में लिया था।
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सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय की पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि हर नागरिक को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह पूरी तरह शांतिपूर्ण होना चाहिए।
अदालत ने कहा कि महाराष्ट्र पुलिस ने इस दौरान काफी संयम बरता है, और ऐसे प्रदर्शनकारियों की पृष्ठभूमि की जांच होनी चाहिए ताकि अपराधियों को आम नागरिकों की आड़ में शामिल होने से रोका जा सके।
मध्य मुंबई के शिवाजी पार्क के स्थानीय निवासियों ने अदालत में आवेदन देकर वहां किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन पर रोक लगाने वाले हाईकोर्ट के आदेश का हवाला दिया, जिस पर अदालत ने याचिकाकर्ताओं और सरकार को जवाब देने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर तय की है।
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