वीरता का जज्बा: सीमाओं की सुरक्षा से लेकर सेना में योगदान तक, देश का मान बढ़ा रहा है पंजाब।
नई दिल्ली: यह सच है कि पंजाब की भूमिका भारत के लिए केवल एक राज्य मात्र की नहीं, बल्कि एक मजबूत ढाल की रही है। भौगोलिक रूप से सरहद पर स्थित होने के कारण, पंजाब ने दशकों से बाहरी खतरों और घुसपैठ का डटकर सामना किया है। चाहे वह देश की सीमाओं की सुरक्षा हो या भारतीय सेना में वीर जवानों का योगदान, पंजाब का जज्बा हमेशा मिसाली रहा है।
पंजाब में अलगाववाद का पुनरुत्थान केवल एक राज्य की कानून-व्यवस्था का मसला नहीं है, बल्कि यह भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक सीधी चुनौती है। इतिहास गवाह है कि जब भी पंजाब में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की गई है, उसके तार सीमा पार बैठे आकाओं और विदेशी धरती पर सक्रिय भारत-विरोधी तत्वों से जुड़े रहे हैं।
आपकी चिंता बिल्कुल जायज है और यह स्थिति वाकई भयावह है। जब हम गैंगवार, ड्रोन से नशीले पदार्थों की तस्करी और अलगाववादी विचारधारा के घातक मेल को देखते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे पंजाब को एक सोची-समझी साजिश के तहत ‘मल्टी-डायमेंशनल वॉर’ में धकेला जा रहा है।
इतिहास बताता है कि किसी भी क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने के लिए सबसे पहले वहां की सामाजिक और नैतिक बुनियाद को कमजोर किया जाता है। पंजाब में हम इसी पैटर्न को देख रहे हैं: पहले युवाओं को नशे की गर्त में धकेलकर उनकी सोचने-समझने की शक्ति छीनना, फिर बेरोजगार और दिशाहीन युवाओं को गैंगवार और छोटे अपराधों की ओर मोड़ना, और अंत में इसी अराजकता का फायदा उठाकर उन्हें ‘अलगाववाद’ की तरफ प्रेरित करना।
आलोचकों का तर्क है कि जब भाजपा राष्ट्रवाद के मुद्दे को बहुत आक्रामक तरीके से उठाती है, तो पंजाब जैसे राज्य में क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय पहचान के बीच टकराव पैदा होने लगता है। इसी खाली जगह का फायदा अलगाववादी विचारधारा उठाती है।
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2022 के बाद 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर पंजाब में काफी बढ़ा था। भले ही उन्हें सीटें ज्यादा न मिली हों, लेकिन उनका ग्राफ 18% के आसपास पहुँच गया था। यह दर्शाता है कि पार्टी शहरी इलाकों में अपनी पैठ बना रही है।
हमारे संविधान में राज्यसभा को काउंसिल ऑफ स्टेट्स कहा जाता है, क्योंकि राज्यों से विधायक अपने प्रतिनिधि चुनकर राज्यसभा में भेजते हैं मतलब जिस अनुपात में लोगों ने वोट दिया होता है, उसी अनुपात में राज्यसभा में सांसद पहुंचते हैं
जिस राज्य में भाजपा के पास विधानसभा में नाममात्र का प्रतिनिधित्व था, अब राज्यसभा में पंजाब का 85.7% (7 में से 6 सांसद) प्रतिनिधित्व भाजपा के पास चला गया है। यह बदलाव आम आदमी पार्टी (AAP) के 7 में से 6 राज्यसभा सांसदों (राघव चड्ढा, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजेंद्र गुप्ता) के भाजपा में शामिल होने के कारण हुआ है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए पंजाब की जनता को यह समझाना एक बहुत बड़ी ‘पॉलिटिकल और नैरेटिव’ चुनौती है। जब कोई पार्टी 6.6% वोट से सीधे राज्यसभा की 85.7% सीटों पर कब्जा करती है, तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह जनादेश का सम्मान है?
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