8 सीटों पर तय जीत, नौवीं के लिए सपा के बागियों पर भाजपा की नजर
नई दिल्ली: विधानसभा चुनाव से ठीक पहले होने जा रहा यह राजयसभा चुनाव विधायको के दलबदल और जोड़ तोड़ की एक नई कहानी लिखने की तैयारी में है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने अपने विधायकों के आंकड़ों के हिसाब से सीटों का गणित मजबूत करने में लगे हैं।
भारतीय जनता पार्टी बीजेपी जहां अपने आठ प्रत्याशियों की जीत को लेकर पूरी तरह बेफिक्र है वहीं अब उसकी नजर नौवीं सीट को भी अपने पाले में करने पर टिकी है।
भाजपा का दावा है कि आठवें उम्मीदवार को जिताने के बाद भी उसके पास 25 अतिरिक्त वोट बचेंगे, जिसके दम पर वह अपना नौंवा प्रत्याशी मैदान में उतारने का मन बना रही है।
इस नौवीं सीट के लिए जरूरी बाकी वोटों का इंतजाम करने के लिए भाजपा मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायकों में सेंधमारी की भरपूर संभावनाएं तलाश रही है।
सपा में सेंधमारी की तैयारी
गणित के मुताबिक राज्यसभा की एक सीट के लिए 36 वोट का कोटा माना जाए तो आठ सीटों के लिए 288 वोट चाहिए।
भाजपा अपने 259 विधायकों के साथ सहयोगी दलों के विधायकों और उसके साथ खड़े माने जा रहे असंबद्ध विधायकों को मिलाकर करीब 299 वोटों के आधार पर रणनीति बना रही है। इस हिसाब से आठ उम्मीदवारों को जिताने के बाद भी उसके पास 11 वोट अतिरिक्त बचेंगे।
यही 11 वोट भाजपा की नौवीं सीट की कोशिश का आधार हैं। नौवें उम्मीदवार के लिए 36 वोट चाहिए होने पर पार्टी को 25 और वोट जुटाने होंगे।
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यह संख्या अपने दम पर पूरी करना भाजपा के लिए संभव नहीं है। ऐसे में उसकी नजर सपा के उन विधायकों पर है जो पिछले राज्यसभा चुनाव में पार्टी लाइन से अलग जाकर मतदान कर चुके हैं या जिनके भाजपा से राजनीतिक समीकरण बने हैं।
भाजपा की नौवीं सीट की राह में रोड़ा
पिछले चुनाव में मनोज पांडेय और पूजा पाल समेत सपा के कई बागी विधायकों ने भाजपा की राह आसान की थी। भाजपा इनमें से कुछ को पूरी तरह अपने पाले में मानकर चल रही है।
हालांकि, मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से नौवीं सीट हासिल करने के लिए 25 अतिरिक्त वोट जुटाना अभी भी भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
सूत्रों के मुताबिक सपा के कई विधायक भाजपा के संपर्क में जरूर हैं, लेकिन वे 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट की पक्की गारंटी मिलने पर ही वोट देने की शर्त रख रहे हैं।
भाजपा के लिए आठवीं सीट पहले से ही अतिरिक्त वोटों पर टिकी है, ऐसे में नौवीं सीट की होड़ इस मुकाबले को और मुश्किल बना देगी। इस चुनावी गणित में अतिरिक्त विधायकों का समर्थन ही जीत तय करेगा।
यही वजह है कि नामांकन से लेकर वोटिंग तक, भाजपा और सपा दोनों की नजरें अपने विधायकों को बचाने और दूसरे खेमे के असंतुष्टों को तोड़ने पर टिकी रहेंगी। 25 वोटों की यह तलाश ही इस चुनाव की सबसे बड़ी सियासी जंग बन चुकी है।
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