क्या होती है छट पूजा, बिहार में क्यों है मान्यता ?

क्या होती है छट पूजा, बिहार में क्यों है मान्यता ?

ब्यूरो। छठ पूजा का स्वरूप और बिहार में इसकी गहरी जड़ों को समझने के लिए इसके आध्यात्मिक और व्यावहारिक पहलुओं को एक सूत्र में देखना आवश्यक है। यह पर्व वास्तव में मानव और प्रकृति के बीच के अटूट संबंध का उत्सव है, जहाँ सूर्य को मात्र एक तारा नहीं बल्कि जीवन का आधार मानकर पूजा जाता है।

बिहार में इसकी व्यापक मान्यता का एक बड़ा कारण इसकी सरलता है, क्योंकि इसमें किसी मध्यस्थ या पुरोहित की आवश्यकता नहीं होती; भक्त स्वयं नदी या तालाब के पानी में उतरकर साक्षात देव को अर्घ्य देता है। यह आत्मनिर्भरता और सीधे जुड़ाव का भाव बिहार के लोक-जीवन की सादगी को दर्शाता है।

इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता इसकी समावेशी प्रकृति है। जहाँ अन्य त्योहारों में सामाजिक ऊंच-नीच दिखाई दे सकती है, छठ के घाट पर समाज के हर वर्ग के लोग एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं।

पूजा में इस्तेमाल होने वाली बाँस की टोकरी (दउरा) और सूप दलित या पिछड़े वर्गों द्वारा बनाए जाते हैं, मिट्टी के चूल्हे कुम्हारों के यहाँ से आते हैं, और फसल किसानों की होती है। इस प्रकार, पूरा समाज आर्थिक और सामाजिक रूप से एक-दूसरे से जुड़ जाता है। छठी मैया के गीतों में जो करुणा और समर्पण है, वह बिहार की माटी की खुशबू और वहाँ के लोगों के संघर्षपूर्ण लेकिन संतोषी जीवन को व्यक्त करता है।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो बिहार के औरंगाबाद (देव), मुंगेर और पटना जैसे स्थानों पर प्राचीन सूर्य मंदिर और उनसे जुड़ी कहानियाँ इस परंपरा को सदियों पुरानी बनाती हैं। चाहे वह राजा प्रियव्रत की कथा हो या सूर्य पुत्र कर्ण की दानवीरता, ये कहानियाँ लोक-चेतना में इस कदर रची-बसी हैं कि छठ केवल एक व्रत न रहकर बिहार की अस्मिता का प्रतीक बन गया है। इस दौरान पूरा क्षेत्र सात्विकता, सेवा और अनुशासन के एक ऐसे वातावरण में डूब जाता है, जिसकी मिसाल दुनिया के किसी भी अन्य कोने में मिलना कठिन है। यह पर्व सिखाता है कि जो अस्त होता है, उसका उदय भी निश्चित है, इसीलिए यहाँ डूबते सूर्य को पहला अर्घ्य देकर जीवन के पूर्ण चक्र का सम्मान किया जाता है।

सौर चिकित्सा:

छठ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक तर्क भी माना जाता है।उगते और डूबते सूर्य के समय जल में खड़े होकर अर्घ्य देने से सूर्य की किरणें सीधे आँखों और शरीर पर पड़ती हैं। इस समय पराबैंगनी (UV) किरणें कम और लाभकारी होती हैं, जो शरीर में विटामिन-D और ऊर्जा के संचार में मदद करती हैं।

प्राकृतिक शुद्धि:

36 घंटे का निर्जला व्रत शरीर के शुद्धिकरण (Detoxification) का एक प्रभावी तरीका है।

पारिस्थितिकी:

इस पूजा में इस्तेमाल होने वाली हर चीज़ पर्यावरण के अनुकूल होती है—जैसे मिट्टी का चूल्हा, बांस के सूप/दउरा, और मौसमी फल। यह त्योहार सिखाता है कि हम प्रकृति के बिना कुछ भी नहीं हैं।

पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं

बिहार में इसकी मान्यता के पीछे कई प्राचीन कहानियाँ प्रचलित हैं। महाभारत काल माना जाता है कि सूर्य पुत्र कर्ण, जो अंग देश (आज का मुंगेर, बिहार) के राजा थे, हर दिन घंटों नदी में खड़े होकर सूर्य की उपासना करते थे। वहीं से यह परंपरा शुरू हुई। एक अन्य कथा के अनुसार, वनवास के दौरान द्रौपदी ने पांडवों के खोए हुए राज्य को वापस पाने के लिए यह व्रत किया था।

रामायण काल में लंका विजय के बाद जब भगवान राम और माता सीता अयोध्या लौटे, तो उन्होंने ‘रामराज्य’ की स्थापना से पहले कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य देव की उपासना की थी।

‘छठी मैया’ कौन हैं?

छठी मैया को सूर्य देव की बहन माना जाता है। पुराणों के अनुसार, वे भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री और प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसलिए उन्हें ‘षष्ठी देवी’ (छठी मैया) कहा जाता है। वे बच्चों की रक्षा करने वाली और उन्हें लंबी आयु देने वाली देवी मानी जाती हैं।

प्रसाद का विशेष महत्व (ठेकुआ)

छठ का सबसे मुख्य प्रसाद ‘ठेकुआ’ है। यह गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बनाया जाता है। यह न केवल स्वादिष्ट होता है बल्कि सर्दियों की शुरुआत में स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक माना जाता है। प्रसाद बनाने की प्रक्रिया में स्वच्छता का स्तर इतना ऊंचा होता है कि जिस चूल्हे पर प्रसाद बनता है, उस पर साधारण खाना नहीं बनाया जाता।


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Raja Zaid

"राजा ज़ैद एक जाने-माने पत्रकार हैं। उन्हें देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ राजनीति और सामायिक विषयो की कवरेज का 15 वर्षो से अधिक का अनुभव है।