अमेरिका से शांति वार्ता पर ईरान की ख़ामोशी के क्या हैं मायने
नई दिल्ली(इंटरनेशनल डेस्क)। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव और हालिया शांति वार्ता की कोशिशों पर ईरान की “ख़ामोशी” से सस्पेंस और गहरा गया है।
इस बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान के अनुरोध पर युद्धविराम को अनिश्चित काल के लिए बढ़ाने की बात की है, लेकिन साथ ही ईरान की बंदरगाहों की नाकेबंदी जारी रखने का भी आदेश दिया है। इस पर भी ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जिसे तस्नीम न्यूज़ एजेंसी ने “अमेरिका की विभाजनकारी नीति” का हिस्सा बताया है।
ईरानी नेतृत्व के भीतर शांति वार्ता को लेकर दो फाड़ नज़र आ रहे हैं। एक ओर संसद अध्यक्ष मोहम्मद ब़ाकेर क़ालीबाफ़ जैसे नेता बातचीत की मेज पर आने के संकेत दे रहे हैं, तो दूसरी ओर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े कट्टरपंथी धड़े किसी भी समझौते को “आत्मसमर्पण” मान रहे हैं। यह ख़ामोशी इसी आंतरिक खींचतान का परिणाम हो सकती है।
ईरान संभवतः अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अनिश्चितता और उनके सख्त रुख (जैसे “बिना शर्त आत्मसमर्पण” की मांग) को भांपने की कोशिश कर रहा है। ईरान सीधे तौर पर कुछ भी कहने से बच रहा है ताकि वह अपनी “बार्गेनिंग पावर” (सौदेबाजी की शक्ति) न खोए और यह देख सके कि अमेरिका वास्तव में कितनी ढील देने को तैयार है।
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ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दी है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए जीवनरेखा है। ईरान की चुप्पी यह संकेत दे सकती है कि वह इस “लिवरेज” का इस्तेमाल अंतिम समय तक करना चाहता है। वह तब तक चुप्पी नहीं तोड़ेगा जब तक कि अमेरिका प्रतिबंधों में बड़ी ढील या जमे हुए फंड्स (Assets) को जारी करने का ठोस आश्वासन न दे दे।
इस्लामाबाद में हुई पिछली वार्ताएं (अप्रैल 2026 की शुरुआत में) बिना किसी नतीजे के खत्म हुई थीं। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराक्छी ने आरोप लगाया था कि अमेरिका “मैक्सिमलिज्म” (अत्यधिक मांगें) अपना रहा है। ईरान की वर्तमान चुप्पी का मतलब यह भी हो सकता है कि उन्हें अमेरिकी प्रस्तावों पर अब भरोसा नहीं रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि कूटनीतिक ख़ामोशी अक्सर पर्दे के पीछे सैन्य या रणनीतिक मजबूती की तैयारी होती है। जब तक ईरान को अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव (जैसे लेबनान और इराक में मित्र गुटों का समर्थन) पर कोई गारंटी नहीं मिलती, वह औपचारिक शांति वार्ता की दिशा में कदम बढ़ाने के बजाय चुप्पी साधे रखना बेहतर समझ रहा है।
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