अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत सहित 5 देशों पर 100% टैरिफ लगाने के दिए संकेत
रूस और ईरान से तेल या दूसरा सामान खरीदने वाले देशों पर अमेरिका भारी जुर्माना लगाएगा, जिससे देश की आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ेगा
नई दिल्ली (इंटरनेशनल डेस्क): अमेरिकी सीनेट ने भारी बहुमत से (86 के मुकाबले 11 वोटों से) एक नया कानून पास किया है। इस कानून के तहत रूस और ईरान से तेल या दूसरा सामान खरीदने वाले देशों पर अमेरिका भारी जुर्माना (टैक्स) लगाएगा।
दिवंगत रिपब्लिकन सांसद लिंडसे ओ ग्राहम के नाम पर तैयार किए गए ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ का उद्देश्य रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध रोकने के लिए आर्थिक रूप से दबाव में लाना और ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना है।
इस विधेयक के दायरे में भारत और चीन जैसे देश आ सकते हैं, जो रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पादों का आयात करते हैं। हालांकि, यदि कोई देश रूस से अपनी कुल ऊर्जा या तेल-गैस का 15 प्रतिशत से कम आयात करता है या अपनी निर्भरता घटाने के प्रयास करता है, तो उसे इन शुल्कों से छूट मिल सकती है, साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति के पास राष्ट्रीय हित में छूट देने का अधिकार भी होगा।
भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखता है तो
यदि यह विधेयक अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ से भी पास होकर कानून बन जाता है, तो भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिकी टैरिफ के जोखिम से निपटने की बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी।
यदि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखता है, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग सामान, रसायन, टेक्सटाइल्स और ऑटो पार्ट्स जैसे निर्यात प्रभावित हो सकते हैं क्योंकि 100% तक के टैरिफ से ये उत्पाद बहुत महंगे हो जाएंगे।
हालांकि, भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी जुलाई के आंकड़ों के मुताबिक करीब 55 प्रतिशत है और देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए इस पर काफी हद तक निर्भर है।
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ऐतिहासिक रूप से देखें तो भारत केवल टैरिफ के दबाव के कारण रूसी तेल खरीदना बंद नहीं करेगा, जैसा कि उसने अगस्त 2025 में भी किया था जब टैरिफ बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया गया था।
भारतीय रिफाइनरियों ने तभी खरीद घटाई थी जब सीधे रूसी कंपनियों पर प्रतिबंध लगे थे, ऐसी स्थिति में भारत को फिर से कूटनीतिक बातचीत का सहारा लेना पड़ सकता है।
भारत पर असर और अमेरिका में राजनीतिक विवाद
दूसरी ओर, अमेरिका के भीतर ही इस विधेयक को लेकर गहरा राजनीतिक और आर्थिक विवाद छिड़ा हुआ है। सीनेटरों और व्यापारिक संगठनों (जैसे यूएस चैंबर ऑफ कॉमर्स) का मानना है कि भारी-भरकम आयात शुल्क का बोझ अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं और व्यवसायों को महंगाई के रूप में उठाना पड़ेगा।
इसके अलावा, राष्ट्रपति को असीमित टैरिफ शक्तियां देने, ईरान पर टैरिफ जोड़ने के प्रावधान और तुर्किये, ब्राजील तथा सिंगापुर जैसे रणनीतिक सहयोगियों व नाटो सहयोगियों के साथ संबंध बिगड़ने की आशंका को लेकर भी डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसदों के बीच मतभेद हैं।
वर्तमान में प्रतिनिधि सभा के सांसद गर्मी की छुट्टियों पर हैं और नजदीक आ रहे चुनावों के चलते इस साल के अंत तक इस विधेयक को अंतिम मंजूरी मिलने में कठिनाई आ सकती है।
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