बांकीपुर चुनाव: पीके पर पोस्टर वार, ‘मुस्लिम टोपी और नोटों’ वाली तस्वीर वायरल
गणितज्ञ प्रोफेसर के.सी. सिन्हा के जन सुराज छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से पहले पटना में प्रशांत किशोर के खिलाफ पोस्टरबाजी से सियासी माहौल गरमा गया है
पटना: बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से पहले बिहार की सियासत में हलचल तेज हो गई है। प्रसिद्ध गणितज्ञ प्रोफेसर के.सी. सिन्हा के जन सुराज छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद पटना के कई इलाकों में प्रशांत किशोर को निशाना बनाते हुए पोस्टर लगाए गए हैं।
इन पोस्टरों पर लिखा है, “केसी सिन्हा तो झांकी हैं, जमानत जब्त होना अभी बाकी है।” हालांकि, ये पोस्टर किसने लगाए हैं, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है और पोस्टर के नीचे “सौजन्य: बांकीपुर की जनता” लिखा गया है।
इन विवादित पोस्टरों में प्रशांत किशोर को मुस्लिम टोपी पहने, गले में गमछा डाले और हाथ में नोटों की गड्डी लिए हुए दिखाया गया है। साथ ही, ‘जन सुराज’ की जगह ‘धन सुराज’ लिखते हुए तस्वीर के ऊपर “वोट नहीं, नोट चाहिए” का संदेश अंकित किया गया है।
खबर लिखे जाने तक इस पूरे मामले पर प्रशांत किशोर या जन सुराज की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई थी, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जन सुराज की ओर से जल्द ही इसका जवाब दिया जा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के पोस्टरों के जरिए बांकीपुर के मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव से पहले धार्मिक और सामाजिक आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण की रणनीति अपनाई जा सकती है, ताकि एक बड़े वोट बैंक को अपने पक्ष में किया जा सके।
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दरअसल, हाल के दिनों में प्रशांत किशोर लगातार मंदिरों की यात्रा कर रहे हैं, जिसे लेकर बिहार की राजनीति में कई तरह की चर्चाएं थीं।
विश्लेषक इसे एक चुनावी रणनीति के तौर पर देख रहे थे, जिसके जरिए वह बीजेपी के पारंपरिक हिंदुत्व और सांस्कृतिक विमर्श के मुकाबले अपनी एक अलग राजनीतिक छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे थे ताकि हिंदू मतदाताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता बढ़ सके।
माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर की इसी रणनीति को काटने के लिए विपक्ष द्वारा यह पोस्टर लगाया गया है।बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों की बात करें तो यहाँ सबसे अधिक करीब 14 से 15 प्रतिशत मतदाता कायस्थ समुदाय से आते हैं।
इसके अलावा सामान्य वर्ग, वैश्य, भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, कुर्मी, कुशवाहा, अति पिछड़ा वर्ग (EBC), दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के मतदाता भी यहाँ निर्णायक भूमिका में हैं।
यही वजह है कि उपचुनाव की घोषणा के साथ ही सभी राजनीतिक दल इन सामाजिक समीकरणों को साधने और मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की पुरजोर कोशिश में जुट गए हैं।
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