सियासी दांव: पाठक का वार, अखिलेश का पलटवार
अखलेश यादव और ब्रजेश पाठक के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। पीडीए फार्मूले और सरकार के कामकाज को लेकर दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर निशाना साधा। अखिलेश ने पाठक को नाकाम बताया, जबकि पाठक ने उनके आरोपों का जवाब देते हुए सपा की राजनीति पर सवाल उठाए।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में खुद को चर्चा के केंद्र में बनाए रखने और विरोधियों के निशाने पर आने की कला को राज्य के उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने बखूबी आत्मसात कर लिया है।
हाल ही में उन्होंने एक अनोखा रुख अपनाते हुए खुद पत्रकार की भूमिका निभाई और अपने ही मंत्रिमंडल के पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नरेंद्र कश्यप का इंटरव्यू ले डाला।
इस बातचीत के दौरान उन्होंने समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके बहुचर्चित ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर तीखा तंज कसा।
नरेंद्र कश्यप ने भी पाठक के सुर में सुर मिलाते हुए सपा के पीडीए को महज एक राजनीतिक शिगूफा बताया और आरोप लगाया कि यह लोकतंत्र की आड़ में केवल एक ही परिवार व जाति विशेष के हित में काम करने का जरिया है।
इस सियासी वार का पलटवार भी उतनी ही तेजी से सामने आया। लोकसभा चुनाव 2024 में इसी पीडीए फॉर्मूले के दम पर बड़ी सफलता हासिल करने वाले सपा मुखिया अखिलेश यादव इस टिप्पणी से बिफर गए।
उन्होंने ब्रजेश पाठक पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें एक ‘नाकाम और बेकार स्वास्थ्य मंत्री’ करार दिया। अखिलेश ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा, “जो स्वास्थ्य मंत्री के रूप में साबित हो गये बेकार, अब वो बन गये पत्रकार… क्योंकि समय बिताने के लिए करना है कुछ काम, सरकार, संगठन, दल में तो पहले ही हुए नाकाम।
प्रदेश की जनता बिन-बिजली गर्मी-बीमारी में तड़प रही है और भाजपाई मंत्री इंटरव्यू-इंटरव्यू खेलकर गर्मी की छुट्टियां मना रहे हैं। फिर डपट पड़ेगी डिप्टी को! बेहद बचकाना!” उन्होंने दावा किया कि सरकार और संगठन में अपनी नाकामी को छिपाने के लिए डिप्टी सीएम अब पत्रकार बन गए हैं, जिसके लिए उन्हें जल्द ही अपने शीर्ष नेतृत्व से डपट पड़ने वाली है।
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छात्र राजनीति से तपकर निकले ब्रजेश पाठक ने अखिलेश के इस तीखे हमले को तुरंत लपक लिया और इसे एक नया सियासी मोड़ दे दिया। पाठक ने पलटवार करते हुए कहा कि सपा प्रमुख ने पत्रकारों को ‘खलिहर’ (बेरोजगार/खाली) बताकर पूरी पत्रकारिता बिरादरी का अपमान किया है।
उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए याद दिलाया कि पं. दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे महान राजनेताओं ने भी राजनीति के साथ-साथ पत्रकारिता और लेखन का कार्य किया था।
संवाद को सनातन धर्म का मूल गुण बताते हुए पाठक ने कहा कि वह स्वास्थ्य मंत्री के रूप में अपना सर्वश्रेष्ठ काम कर रहे हैं और एक कार्यकर्ता के नाते संवाद की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने दो टूक अंदाज में कहा, “अगर इससे किसी को मिर्ची लगे तो मैं क्या करूं…!”
साल 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर शुरू हुई यह राजनीतिक गोटी और बयानों की तीरंदाजी फिलहाल थमती नहीं दिख रही है।
आगामी चुनावों में जहां भाजपा अगड़ों के साथ पिछड़ों और दलितों को साधने के अपने फॉर्मूले पर टिकी है, वहीं सपा अपने पीडीए को और मजबूत करने में जुटी है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि भले ही इस सियासी बयानबाजी का अंत चुनाव तक न हो, लेकिन ब्रजेश पाठक ने खुद को चर्चा के केंद्र में लाकर यह साबित कर दिया है कि वह विरोधियों को अपने ऊपर बोलने के लिए मजबूर करने की कला में माहिर हैं।
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