रिटायरमेंट पर बोले जस्टिस संजय करोल ,जज भगवान नहीं होते, हर फैसला सही नहीं हो सकता

रिटायरमेंट पर बोले जस्टिस संजय करोल ,जज भगवान नहीं होते, हर फैसला सही नहीं हो सकता

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई भाषण में कहा कि जज भगवान नहीं होते और उनसे भी गलतियाँ हो सकती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा की एक अच्छा जज बनने के लिए विनम्रता और हर पीड़ित के पीछे के असली इंसान को समझना बेहद जरुरी है।

जस्टिस करोल के अनुसार संविधान का मकसद सिर्फ कानून का पालन कराना नहीं बल्कि न्याय करना है और उनके लिए हमेशा यह तय करना सबसे बड़ी जिम्मेदारी रहा की क़ानूनी रूप से सही होने के साथ साथ किसी के साथ अन्याय न हो।

जस्टिस करोल ने कहा

सप्रीम कोर्ट से विदाई के अवसर पर जस्टिस करोल ने अपने 40 साल के लंबे कानूनी सफर को याद करते हुए कहा कि कोर्टरूम उनके लिए सिर्फ काम की जगह नहीं बल्कि गरिमा और ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाने का जरिया रहा है।

उन्होंने कहा कि जजों को केवल कानूनी दलीलों और दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ‘शब्दों के बीच की खामोशी’ और इंसानी दर्द को भी समझना आना चाहिए। जस्टिस करोल ने इस बात पर जोर दिया कि सुप्रीम कोर्ट का असली महत्व आम नागरिकों के उस भरोसे में है जो न्याय की उम्मीद लेकर यहां पहुंचते हैं, साथ ही हमें उन लोगों को भी नहीं भूलना चाहिए जो महंगी और जटिल न्याय व्यवस्था के कारण अदालत तक पहुंच ही नहीं पाते।

इसके साथ ही उन्होंने कानून और संवैधानिक मूल्यों को किसी रस्म-रिवाज की बजाय अपने ‘कर्तव्य’ के रूप में देखने की बात कही।

अपने विदाई भाषण में जस्टिस करोल ने कहा कि जज का मुख्य कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि अदालत में खड़े हर छोटे बेबस व्यक्ति की बात पूरी गंभीरता से सुनी जाए। उन्होंने वकीलों और आम लोगो से कहा की न्याय के सिद्धांत केवल अदालतों और जजों के कपड़ो तक सिमित नहीं है बल्कि हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी और फैसलों में खुद का जज बनकर सही और गलत का चुनाव करना चाहिए।


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Sanjana Kumari

संजना कुमारी: रियल-टाइम खबरों पर मजबूत पकड़ रखने वाली डिजिटल कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार, जो सामाजिक-राजनीतिक, क्षेत्रीय और सांस्कृतिक घटनाक्रमों को डिजिटल दर्शकों के लिए सटीक व आकर्षक बनाती हैं