दीये जलते हैं, पटाखे नहीं: इन 10 गांवों में 21 साल से पक्षियों की खातिर अनोखे अंदाज से मनाते हैं दिवाली

दीये जलते हैं, पटाखे नहीं: इन 10 गांवों में 21 साल से पक्षियों की खातिर अनोखे अंदाज से मनाते हैं दिवाली

चेन्नई। रोशनी के महापर्व दिवाली का मतलब जहन में आते ही कानफोड़ू पटाखों की गूंज और आसमान में फैलने वाला धुएं का गुबार नजर के सामने आ जाता है। देश के कोने-कोने में आतिशबाजी के साथ यह त्योहार मनाया जाता है, लेकिन तमिलनाडु के इरोड और शिवगंगा जिलों के करीब 10 गांवों में पिछले 21 सालों से दिवाली की रात बिल्कुल शांत गुजरती है। यहां न कोई रॉकेट आसमान चीरता है और न ही अनार-सुतली बमों की आवाज सुनाई देती है।

इस अनोखे संकल्प के पीछे कोई कानूनी पाबंदी नहीं, बल्कि उन बेजुबान प्रवासी पक्षियों के प्रति ग्रामीणों का अगाध प्रेम है, जो हजारों किलोमीटर का सफर तय कर हर साल इन गांवों को अपना आशियाना बनाते हैं।

इरोड का प्रसिद्ध ‘वेल्लोड पक्षी अभयारण्य’ और शिवगंगा का ‘वेट्टनगुडी पक्षी अभयारण्य’ इन गांवों के ठीक पास स्थित हैं। हर साल अक्टूबर-नवंबर के महीने में जब पूरा देश दिवाली की तैयारियों में जुटा होता है, ठीक उसी समय यूरोप, साइबेरिया, ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका जैसे देशों से दुर्लभ प्रवासी पक्षी इन अभयारण्यों और स्थानीय पेड़ों पर डेरा डालने पहुंचते हैं।

यहीं उनका प्रजनन काल (Breeding Season) भी होता है। जानकारों के मुताबिक, पटाखों की तेज आवाज, अचानक होने वाली चमक और बारूद का धुआं इन संवेदनशील परिंदों के लिए जानलेवा साबित होता है। धमाकों के डर से कई बार मादा पक्षी अंडे छोड़कर भाग जाती हैं या घोंसले से गिरकर चूजे दम तोड़ देते हैं।

इस बात को समझते हुए दो दशक पहले (लगभग 2005 के आसपास) यहां के बुजुर्गों और युवाओं ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि पक्षियों की जान और सुकून की खातिर वे कभी भी अपने गांवों में पटाखे नहीं जलाएंगे। तब से लेकर आज तक, पीढ़ी दर पीढ़ी इस नियम का सख्ती से पालन हो रहा है।

पटाखे न जलाने का यह मतलब कतई नहीं है कि यहां दिवाली का उत्साह फीका रहता है। बल्कि इन गांवों में त्योहार का असली और पारंपरिक रूप देखने को मिलता है। शाम ढलते ही पूरा गांव मिट्टी के दीयों और पारंपरिक दीपों की रोशनी से जगमगा उठता है। लोग नए कपड़े पहनते हैं, एक-दूसरे के घर जाकर मिठाइयां बांटते हैं और गले मिलते हैं।

वर्षो से चली आ रही इस रिवाज का बच्चे भी पालन करते हैं। देश के बाकी हिस्सों में जहां बच्चे पटाखों के लिए जिद करते हैं, वहीं इन गांवों के बच्चे चुपचाप पेड़ों पर चहकते परिंदों को निहारना और उनके साथ दिवाली मनाना ज्यादा पसंद करते हैं।

वन विभाग भी बढ़ाता है हौसला

ग्रामीणों की इस अनुकरणीय संवेदनशीलता को सम्मान देने के लिए तमिलनाडु वन विभाग भी हर साल आगे आता है। दिवाली के अवसर पर वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी इन गांवों में घर-घर जाकर ग्रामीणों, खासकर बच्चों को मिठाइयां बांटते हैं और उनका हौसला बढ़ाते हैं।

पर्यावरण असंतुलन और प्रदूषण के इस दौर में तमिलनाडु के इन 10 गांवों ने यह साबित कर दिया है कि असली जश्न दूसरों की जिंदगी (चाहे वह इंसान हो या परिंदा) की कीमत पर नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व की भावना के साथ मनाया जाना चाहिए।


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Raja Zaid

"राजा ज़ैद एक जाने-माने पत्रकार हैं। उन्हें देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ राजनीति और सामायिक विषयो की कवरेज का 15 वर्षो से अधिक का अनुभव है।