CJI सूर्यकांत की टिप्पणी पर विवाद: पर्यावरणविदों और पूर्व नौकरशाहों ने खोला मोर्चा, लिखी खुली चिट्ठी
“देश के विकास बनाम पर्यावरण/नागरिक अधिकार” की बहस से जुड़ा है। जहां एक तरफ अदालत विकास कार्यों में बेवजह की देरी को लेकर सख्त रुख अपना रही थी, वहीं नागरिक समाज का मानना है कि इस तरह की टिप्पणी से जनहित याचिकाओं (PIL) की मूल भावना और निष्पक्ष न्याय की उम्मीद को ठेस पहुंचती है।
नई दिल्ली: देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी को लेकर कानूनी और सामाजिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ द्वारा विकास परियोजनाओं में बाधा डालने वाली याचिकाओं की आलोचना किए जाने के बाद पूर्व नौकरशाहों, वकीलों, पर्यावरणविदों और नागरिक समाज के समूहों ने एकजुट होकर मोर्चा खोल दिया है।
इस मामले में प्रधान न्यायाधीश को अलग-अलग समूहों द्वारा खुली चिट्ठी लिखकर इस टिप्पणी पर गंभीर चिंता जताई गई है।
यह पूरा विवाद करीब 15 दिन पुराना है, जब 11 मई को सुप्रीम कोर्ट में CJI जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ गुजरात के पिपावाव बंदरगाह के विस्तार को मिली पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान देश में विकास परियोजनाओं को अदालतों में चुनौती देने की बढ़ती प्रवृत्ति पर पीठ ने नाराजगी जताई।
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CJI ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा कि हमें इस देश में एक भी ऐसी परियोजना दिखाएं, जहां इन तथाकथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कहा हो कि हम इसका स्वागत करते हैं। पीठ ने आगे कहा कि आप हर चीज को अदालत में घसीट लाते हैं और इस देश में जिस तरह की याचिकाएं दायर की जा रही हैं, उनका मकसद सिर्फ विकास को रोकना है, क्योंकि अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश कैसे आगे बढ़ेगा।
CJI की इन टिप्पणियों के विरोध में पूर्व नौकरशाहों के मंच ‘कॉन्स्टिट्यूशन कंडक्ट ग्रुप’ के 71 सदस्यों ने एक खुली चिट्ठी लिखी है। उनका कहना है कि देश के सबसे बड़े न्यायालय की ऐसी टिप्पणियों से पर्यावरण संरक्षण के सुरक्षा उपाय कमजोर हो सकते हैं और निचली अदालतें भी पर्यावरण के मामलों के प्रति ऐसा ही रुख अपना सकती हैं।
चिट्ठी में यह भी चिंता जताई गई है कि पर्यावरण मंत्रालय के ज्यादातर विशेषज्ञ निकाय केवल सरकारी अधिकारियों से भरे होते हैं और वे रबर स्टैंप की तरह काम करते हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इन पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए।
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