सुप्रीम कोर्ट: लिफ्ट हादसे के लिए मेंटेनेंस कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि लिफ्ट बनाने और उसका रखरखाव करने वाली कंपनियां किसी भी हादसे की जिम्मेदारी से नहीं बच सकती हैं
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि लिफ्ट बनाने और उसका रखरखाव करने वाली कंपनियां किसी भी हादसे की जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं।
अदालत ने साल 2003 में रॉ (RAW) अधिकारी विपिन हांडा की लिफ्ट हादसे में हुई मौत से जुड़े मामले में ओटिस (OTIS Elevator India Ltd.) की अपील खारिज करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के फैसले को बरकरार रखा है।
यह मामला 20 मार्च 2003 का है, जब नई दिल्ली के सीजीओ कॉम्प्लेक्स स्थित रॉ कार्यालय में बैठक खत्म होने के बाद अधिकारी लिफ्ट नंबर-6 से नीचे आ रहे थे। छठी और सातवीं मंजिल के बीच लिफ्ट अचानक रुक गई और मैनुअल बचाव कार्य के दौरान लिफ्ट के अचानक नीचे खिसक जाने से अधिकारी विपिन हांडा की मौके पर ही मौत हो गई थी।
तकनीकी जांच रिपोर्ट में सामने आया था कि संबंधित लिफ्ट पहले भी बिना वजह कई बार रुक चुकी थी और बिजली के वोल्टेज की समस्या व अपर्याप्त प्रशिक्षण जैसी कमियों को समय पर दूर नहीं किया गया था।
इसे भी पढ़ें: सहारनपुर मस्जिद पर बुलडोजर एक्शन पर क्या बोलीं मायावती
सुनवाई के दौरान ओटिस कंपनी ने तर्क दिया था कि दुर्घटना उसकी लापरवाही से नहीं बल्कि बचाव के दौरान हुई मानवीय गलती और बिजली की समस्या के कारण हुई थी, और उसने इसकी जानकारी मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (MES) को पहले ही दे दी थी।
हालांकि, NCDRC ने हादसे के लिए ओटिस को 70%, एमईएस को 25% और रॉ को 5% जिम्मेदार मानते हुए पीड़ित परिवार को ब्याज सहित 3.01 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि लिफ्ट जैसी मशीनें सीधे जनता की सुरक्षा से जुड़ी होती हैं और खराबी की जानकारी होने के बावजूद समय पर कार्रवाई न करना कंपनी की गंभीर लापरवाही है।
अदालत के इस फैसले से देशभर की लिफ्ट कंपनियों और बिल्डिंग मैनेजमेंट की जवाबदेही काफी बढ़ गई है। अब कंपनियों के लिए लिफ्ट की नियमित जांच और समय पर मरम्मत करना अनिवार्य होगा।
यदि लिफ्ट में किसी तकनीकी खराबी या रखरखाव में कमी के कारण कोई हादसा होता है, तो पीड़ित परिवार पुलिस में शिकायत दर्ज कराने के साथ-साथ उपभोक्ता आयोग या अदालत का रुख कर न्याय और मुआवजे की मांग कर सकता है।
Discover more from
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
