दबाव का असर या चुनावी रणनीति; आखिर क्यों अचानक नरम पड़ा चुनाव आयोग का रुख
नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने 1 जनवरी, 2027 की पात्रता तिथि के साथ अचानक मतदाता सूचियों के ‘विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण’ की घोषणा की है, जबकि वर्ष 2025 और 2026 में यह प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी।
माना जा रहा है कि यह कदम उन आलोचनाओं के बाद उठाया गया है, जिनमें आयोग पर युवा व नए मतदाताओं के पंजीकरण में बाधा डालने का आरोप लगा था। वहीं, पिछली प्रक्रियाओं से छूटे पुराने मतदाताओं से नए पंजीकरण के लिए ‘फॉर्म 6’ भरवाने की शर्त भी प्रक्रिया की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है।
एसआईआर (SIR) प्रक्रिया की तीखी आलोचना और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल होने के बाद, चुनाव आयोग ने पारदर्शिता, नाम हटाने/जोड़ने और फॉर्म 6 से जुड़े मुद्दों पर कई छूट व स्पष्टीकरण दिए हैं, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि उसने संशोधित फॉर्म 6 को कोई मंजूरी नहीं दी है।
राज्यों में अलग-अलग नियम और विसंगतियाँ
लगातार दबाव के चलते चुनाव आयोग राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को पढ़ने योग्य फॉर्मेट में मतदाता सूची की सॉफ्ट कॉपी देने, साप्ताहिक दावे व आपत्तियों की सूची साझा करने तथा सूची में हुए बदलावों की जानकारी देने पर सहमत हुआ है—जो एक ऐसी मांग थी जिसे वह 2018 से खारिज करता आ रहा था।
दिल्ली में सॉफ्टवेयर द्वारा पाई गई 33 लाख विसंगतियों को ठीक करने के लिए आयोग ने मतदाताओं को व्यक्तिगत सुनवाई या सबूत के लिए बुलाने के बजाय बीएलओ (BLO) को घर-घर जाकर जांच करने की विशेष सुविधा दी और 20 लाख कमियों को जल्द दूर करने का दावा किया, लेकिन अन्य राज्यों के मतदाताओं को ऐसी राहत नहीं दी गई; पश्चिम बंगाल में 37 लाख लंबित अपीलों का हवाला देकर इसे कोर्ट का मामला बताया गया।
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वहीं ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ के खुलासे के बाद उत्तर प्रदेश के सीईओ को सॉफ्टवेयर द्वारा बिना कारण या अजीब अक्षरों के आधार पर 85,854 ऑटो-जनरेटेड फॉर्म के जरिए मुस्लिम मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाने की कोशिशों की पुष्टि करनी पड़ी, जिसे उन्होंने महज तकनीकी खामी बताकर टाल दिया और किसी पर एफआईआर दर्ज नहीं की।
गुजरात, कर्नाटक और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी लगे इसी तरह के गंभीर आरोपों पर आयोग ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हाल ही में दी गई रियायतें चुनाव आयोग पर बढ़ रहे न्यायिक और राजनीतिक दबाव का ही परिणाम हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग को जारी नोटिस के बाद विपक्षी दलों का मानना है कि आयोग की हालिया ढील और बदलाव कानूनी कार्रवाई से बचने की एक रणनीति हैं। आलोचकों के अनुसार, जो रियायतें अब दी जा रही हैं, वे पहले भी दी जा सकती थीं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ये कदम अदालत के दबाव में उठाए गए हैं। वहीं, चुनाव आयोग का पक्ष है कि उसकी सभी प्रक्रियाएं निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की दिशा में स्वाभाविक कदम हैं।
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